है। प्रबना प्रकसी िाग-िपेट के सीधे - पहिा सत्याग्रह था और सुभाा जी की पहिी मप्रहिा सत्याग्रही थीं।
कवप्रयत्री सन् 1948 में एक सड़क के संवाददाता ने अपनी एक िरपोटफ में उनका उल्लेख िोकि सरोलजनी कहकर प्रकया था।
1920 - 21 में सुभाा और िक्ष्मण चसह में और गृहस्थी के छोटे - मोटे कामों में भी रमी रह सकती थीं।
सीधे सच्चा काव्य रचने वािी यह
दुघ ट
ना में हमसे प्रबछड़ गई। ‘मुकुि’
और ‘प्रत्रधारा’ आपके काव्य संग्रह हैं।
अल्खि भारतीय कांग्र स
कमेटी के
रोज़-रोज़ सभाएँ होती थीं और लजनमें सुभाा भी बोिती थीं। 'टाइम्स ऑर् इंप्रिया'
सुभाा जी में बि े सहज ढंग से गंभीरता और चंचिता का अद्भ त
संयोग था। वे लजस सहजता स
दे श की पहिी स्त्री सत्याग्रही बनकर जेि जा सकती थीं, उसी तरह अपने घर में , बाि-बच्चों
सुभाा कुमारी चौहान ने 15 वषफ की आयु से ही लिखना शुरू कर प्रदया था। लजस
सदस्य थे। उन्होंने नागपुर कांग्र स
में भाग समय इन्होंिने लिखना शुरू प्रकया राजनैप्रतक दृप्रष्ट से उथि पुथि का युग था। प्रब्रप्रटश शासक
पहुँचाया। त्याग और सादगी में सुभाा शुरू कर दी थी। धीरे – धीरे अंग्र ज
ी शासन का दमन चक् बढ ता चिा गया। भारतीय स्व्यं को
लिया और घर-घर में कांग्रेस का संदेश
जी सफ़ेद खादी की प्रबना प्रकनारी धोती
पहनती थीं। गहनों और कपि ों का बहुत
शौ़ि होते हुए भी वह चूि ी और चबदी का
बप्रनए की तरह यहां आए थे और प्ला सी के युद्ध के बाद तो उन्होंने अपनी जि े ही जमानी
भाग्यं के भरोसे छोि प्रनराशाजनक ल्स्थप्रत में पहुंच गए थे। ऐसे में कप्रवयों, साप्रहत्यककारों न
अपनी किम के माधयंम से देशवाप्रसयों को जागृत प्रकया।
वतफमान के आइने में स्र्लणम अतीत की ंांकी प्रदखाकर िोगों को िेिरत प्रकया।
ियोग नहीं करती थी। उन को सादा गांधी जी ने सत्याग्रह का जो पाठ पढ ाया था उससे राष्ट्रीय आंदोिन को अत्यमन्तस मजबूती
पूछ ही लिया, 'बेन! तुम्हारा ब्याह हो को नौजवानों का िेरणा स्रोत मानती हैं। अनुभूप्रत पप्रत्रका के अनुसार ‘‘चहदी काव्या जगत म
वेशभूषा में दे ख कर बापू ने सुभाा जी स
गया है ?' सुभाा ने कहा, 'हाँ! ' और प्रर्र
उत्साह से बताया प्रक मेरे पप्रत भी मेरे
साथ आए हैं।
इसको सुनकर बा और बाप
प्रमिी। सुभाा कुमारी चौहान का हृदय भी दे शिेम से ओत िोत था। दे श पर कुबाफन हुए वीरों
ये अकेिी ऐसी कवप्रयत्री हैं लजन्होंने अपने कंठ की पुकार से िाखों युवक-युवप्रतयों को युग -
युग की अकमफण्य उदासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम में अपने को समर्षपत कर दे ने केलिए
िेिरत प्रकया है।
सहज सरि भाषा में जप्रटि से जप्रटि भावों को प्रपरोकर पाठक के मन में उत्साह
जहाँ आश्वस्त हुए वहाँ कुछ नाराज़ भी जगा दे ती हैं। "बुंदेिखंि में िोक-शैिी में गाये जाने वािे छं द को िेकर उसी में ंाँसी की
माथे पर प्रसन्दूर क्यों नहीं है और तुमन उनकी इस रचना को अँग्रेजों ने जब्त कर लिया था तथाप्रप भारतीय जन-जन को यह कप्रवता
हुए। बापू ने सुभाा को िाँटा, 'तुम्हार
चूप्रि याँ क्यों नहीं पहनीं? जाओ, कि
प्रकनारे वािी साि ी पहनकर आना।'
रानी जैसी रोमांचक कथा लिखना उनकी िप्रतभा और दृप्रष्ट दोनों का पिरचय दे ता है।" यद्यप्रप
कंठाग्र हो गयी थी।
सुभाा जी की काव्य साधना के पीछे उत्कट दे श िेम , अपूवफ साहस तथा आत्मोत्सग
सुभाा जी के सहज स्नेही मन और की िबि कामना है। इनकी कप्रवता में सच्ची वीरांगना का ओज और शौयफ िकट हुआ है।
चिता था। उनका जीवन िेम से युक्त था भारतीय युवक-युवप्रतयों को युग -युग की अकमफण्य उपासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम म
प्रनश्छि स्वभाव का जादू सभी पर
और प्रनरंतर प्रनमफि प्यार बाँटकर भी
ख़ािी नहीं होता था। 1922 का
जबिपुर का 'ंंिा सत्याग्रह' दे श का
चहदी काव्य जगत में ये अकेिी ऐसी कवप्रयत्री हैं लजन्होंने अपने कंठ की पुकार से िाखों
अपने को समर्षपत कर दे ने के लिए िेिरत प्रकया। वषों तक सुभाा जी की 'ंांसी वािी रानी
थी' और 'वीरों का कैसा हो वसंत ' शीषफक कप्रवताएँ िाखों तरुण-तरुलणयों के हृदय में आग
र्ूँकती रहेंगी।
रचनाएँ :
• ंांसी की रानी • ल्खिौनेवािा • र्ूि के िप्रत • िथम दशफन • वेदना
• साध • मधुमय प्यािी • मेरे पप्रथक • उपेक्षा • प्रवजयी मयूर
• मेरा नया बचपन
• जलियाँवािा में बसंत
• यह कदम्ब का पेि
• ठु करा दो या प्यार करो
• कोयि
• पानी और धूप
• उल्लास
• ल्ंिप्रमि तार
• मेरा जीवन
• रानी की समाप्रध पर
• इसका रोना
• नीम
• वीरों का कैसा हो वसंत • मुरंाया र्ूि
• चिते समय
• किह-कारण
• जीवन-र्ूि
• भ्रम
• समपफण
• चचता
• प्रियतम स
20 । The Progress of Jharkhand (Monthly)
• पिरचय
• अनोखा दान
• तुम
• व्याकुि चाह
• आराधना
• पूछो
• मेरा गीत
• प्रवदा
• ितीक्षा
• स्वदे श के िप्रत
• प्रबदाई
• मेरी टेक
• िभु मेरे मन की जानो
• बालिका का पिरचय