The Progress Of Jharkhand #46 | Page 19

राष्ट्रभक्त कवयित्री थी संस्कृवत सुभद्रा कुमारी चौहान  राजिक्ष्मी जमुआर (संकिन) सुभाा कुमारी चौहान प्रहन्दी की सुिप्रसद्ध कवप्रयत्री और िेल्खका थीं। उनके दो कप्रवता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह िकालशत हुए पर उनकी िप्रसप्रद्ध ंाँसी की रानी कप्रवता के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवप्रयत्री रही हैं , प्रकन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेि यातनाएँ सहने के पिात अपनी अनुभूप्रतयों को कहानी में भी व्यक्त प्रकया। वातावरण प्रचत्रण-िधान शैिी की भाषा सरि तथा काव्यात्मक है , इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है। उ नका जन्म नागपंचमी के प्रदन रामनाथ चसह' था। सुभाा कुमारी की काव्य िप्रतभा बचपन से ही सामने आ गई थी। आपका प्रनहािपुर नामक गांव म में नौ वषफ की आयु में सुभाा की पहिी कप्रवता ियाग से प्रनकिने वािी पप्रत्रका 'मयाफदा' म इिाहाबाद के प्रनकट रामनाथचसह के जमींदार पिरवार में हुआ था। बाकयकाि से ही वे कप्रवताएँ रचन िगी थीं। उनकी रचनाएँ राष्ट्रीयता की भावना से पिरपूणफ हैं। सुभाा कुमारी चौहान, चार बहने और दो भाई थे। उनके प्रपता ठाकुर रामनाथ चसह लशक्षा के िेमी थे और उन्हीं की दे ख -रेख म प्रवद्याथी जीवन ियाग में ही बीता। 'क्ास्थवेट गकसफ कॉिेज ' में आपने लशक्षा िाप्त की। 1913 िकालशत हुई थी। यह कप्रवता 'सुभााक ँ ु विर' के नाम से छपी। यह कप्रवता ‘नीम’ के पेि पर लिखी गई थी। सुभाा चंचि और कुशाग्र बुप्रद्ध थी। पढ ाई में िथम आने पर उसको इनाम प्रमिता था। सुभाा अत्यंत शीघ्र कप्रवता लिख िािती थी, मानो उनको कोई ियास ही न करना पि ता हो। स्कूि के काम की कप्रवताएँ तो वह साधारणतया घर से आते - जाते तांगे में लिख िेती थी। इसी कप्रवता की रचना करने के कारण से स्कूि में उसकी बि ी िप्रसप्रद्ध थी। 1919 ई. में उनका प्रववाह 'ठाकुर िक्ष्मण चसह' से हुआ, प्रववाह के पिात व उनकी िारल्म्भक लशक्षा भी हुई। 1919 जबिपुर में रहने िगीं। सुभााकुमारी चौहान अपने नाटककार पप्रत िक्ष्मणचसह के साथ शादी प्रववाह के बाद वे जबिपुर आ गई थीं। महत्त्वपूणफ वषफ गुज़ारे। गृहस्थी और नन्हे - नन्हे बच्चों का जीवन सँवारते हुए उन्होंने समाज और में खंिवा के ठाकुर िक्ष्मण चसह के साथ 1921 म गांधी जी के असहयोग आंदोिन में भाग िेने वािी के िेढ वषफ के होते ही सत्याग्रह में शाप्रमि हो गईं और उन्होंने जेिों में ही जीवन के अनेक राजनीप्रत की सेवा की। आपका पहिा काव्य-संग्रह 'मुकुि' 1930 में िकालशत हुआ। इनकी चुनी हुई वह िथम मप्रहिा थीं। वे दो बार जेि भी कप्रवताएँ 'प्रत्रधारा' में िकालशत हुई हैं। 'ंाँसी की रानी' इनकी बहुचर्षचत रचना है। कप्रवता : जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान न ल्खिौनेवािा, चिते समय, चचता, जीवन-र्ूि, ंाँसी की रानी की समाप्रध पर, ंांसी की गई थीं। सुभाा कुमारी चौहान की 'प्रमिा तेज से तेज ' नामक पुस्तक म लिखी है। इसे हंस िकाशन, इिाहाबाद ने िकालशत प्रकया है। वे एक रचनाकार होने के साथ-साथ स्वाधीनता संग्राम की सेनानी भी थीं। िॉ. मंगिा अनुजा की पुस्तक सुभाा कुमारी चौहान उनके अनोखा दान, आराधना, इसका रोना, उपेक्षा, उल्लास, किह-कारण, कोयि, रानी, ल्ंिप्रमि तारे , ठु करा दो या प्यार करो, तुम , नीम, पिरचय, पानी और धूप , पूछो, ितीक्षा, िथम दशफन , िभु तुम मेरे मन की जानो, प्रियतम से , र्ूि के िप्रत , प्रबदाई, भ्रम, मधुमय प्यािी, मुरंाया र्ूि, मेरा गीत, मेरा जीवन, मेरा नया बचपन, मेरी टेक , मेरे पप्रथक, यह कदम्ब का पेि -2, यह कदम्ब का पेि , प्रवजयी मयूर , प्रवदा, वीरों का हो कैसा वसन्त, वेदना, व्याकुि चाह, समपफण , साध, स्वदे श के िप्रत , जलियाँवािा बाग में बसंत। सन् 1904 में इिाहाबाद के प्रनहािपुर ग्राम में जन्मी सुभााकुमारी चौहान की साप्रहल्त्यक व स्वाधीनता संघषफ के जीवन कप्रवताओं में राष्ट्रचेतना और ओज कूट-कूट कर भरा है। बचपन से ही आपके मन म नागपंचमी के प्रदन 16 अगस्त 1904 को कई बार जेि -यात्रा की। पर िकाश िािती है। सुभाा कुमारी चौहान का जन्म इिाहाबाद के पास प्रनहािपुर गाँव म हुआ था। उनके प्रपता का नाम 'ठाकुर दे शभप्रक्त की भावना इतने गहरे तक पैठ बनाए हुए थी प्रक सन् 1921 में अपनी पढ़ाई छोड़ आपने असहयोग आंदोिन में सप्रक्य रूप से भाग लिया। आज़ादी की इस िड़ाई में आपन प्रववाह के बाद आप जबिपुर में बस गईं। कथनी-करनी की समानता सुभाा जी के व्यप्रक्तत्व का िमुख अंग है। आपकी रचनाएँ सुनकर मरणासन्न व्यप्रक्त भी ऊजाफ से भर सकता द प्रोग्रेस ऑफ़ झारखण्ड (माससक) । 19