ंारखंि के इप्रतहास के जानकार बी पी दें गे। इसके बाद अंग्रेजों ने इन चारों भाइयों को प्रगरफ्तार करने का आदे श प्रदया, परंतु लजस
और भैरव चारों भाइयों ने िगातार िोगों दौरान सरकारी अप्रधकािरयों में भी इस आंदोिन को िेकर भय िाप्त हो गया था।
केशरी कहते हैं प्रक प्रसद्धू , कान्ह, चांद
के असंतोष को एक आंदोिन का रूप
बनाया।
उस समय संथािों को बतिाया
गया प्रक प्रसद्धू को स्वप्न में बोंगा लजनके
हाथों में बीस अंगूलियां थी ने बताया है प्रक
पुलिस दरोगा को वहां भेजा गया था संथालियों ने उसकी गदफ न काट कर हत्या कर दी। इस
इस क्ांप्रत के संदेश के कारण संथाि में अंग्रेजों का शासन िगभग समाप्त हो गया
था। अंग्रेजों ने इस आंदोिन को दबाने के लिए जमकर प्रगरफ्तािरयां की गईं और प्रवाोप्रहयों
पर गोलियां बरसने िगीं। आंदोिनकािरयों की प्रगरफ्तारी के लिए पुरस्कारों की घोषणा
की गई।
बहराइच में अंग्रेजों और आंदोिनकािरयों की िि ाई में चांद और भैरव शहीद हो
‘जुमीदार, महाजोन, पुलिस आर राजरेन गए। िप्रसद्ध अंग्रेज इप्रतहासकार हंटर पने अपनी पुस्तक ‘एनकस ऑर् रूिर बंगाि’ म
राज के अमिे और सूदखोरों का नाश हो)।
वे बताते हैं प्रक बोंगा की ही संथाि पूजा- रही और िोग िि ते रहे।
पुस्तक में लिखा गया है प्रक अंग्रेजों का कोई भी प्रसपाही ऐसा नहीं था जो इस
अमिो को गुज क
मा।’ (जमींदार, पुलिस,
अचफना करते थे। इस संदेश को िुगिुगी
प्रपटवाकर तथा गांवों-गांवों तक पहुंचाया
गया। इस दौरान िोगों ने साि की टहनी
को िेकर गांव -गांव यात्रा की।
आंदोिन को कायफरूप दे ने के
लिखा है प्रक संथािों को आत्मसमपफण की जानकारी नहीं थी, लजस कारण िुगिुगी बजती
बलिदान को िेकर शर्षमदा न हुआ हो। इस युद्ध में करीब 20 हजार वनवाप्रसयों ने अपनी
जान दी थी। साप्रथयों के स्वाथफ के कारण प्रसद्धू और कान्ह को भी प्रगरफ्तार कर लिया
गया और प्रर्र 26 जुिाई को दोनों भाइयों को भगनािीह गांव में खुि आ
म एक पेि पर
टांगकर र्ांसी की सजा दे दी गई।
ंारखंि के प्रवनोबा भावे प्रवश्वप्रवद्यािय से सेवाप्रनवृत्त िोर्ेसर प्रवमिेश्वर ंा
लिए परंपरागत शस्त्रों से िैस होकर 30 कहते हैं प्रक संथाि हि के महत्व का अंदाजा इसी से िगाया जा सकता है प्रक जमफनी के
भगनािीह पहुंचे और आंदोिन का के संथाि क्ांप्रत को जनक्ांप्रत बताया है ।
जून 1855 को 400 गांवों के िोग
सूत्रपात हुआ। इसी सभा में यह घोषणा
कर दी गई प्रक वे अब मािगुजारी नहीं
समकािीन चचतक कािफ माक् सफ ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑर् इंप्रियन प्रहस्ीी’ में जून 1855
ंारखंि के इप्रतहास के पन्नों में जि-जंगि-जमीन, इप्रतहास-अल्स्तत्व बचान
का संघ ष
के लिए जून महीना शहीदों का महीना माना जाता है।
मुण्डा आन्दोलन
म ण् ु डा ब्वद्रोह या 'ब्बरसा ब्वद्रोह' का प्रारम्भ ब्िब्टश भारत में 1895 में हुआ। यह
ब्वद्रोह छोटा िागप र ु में एक 21 वषीय य व ु क ब्बरसा म ड ं ु ा िे प्रारम्भ ब्कया था,
ब्जससे ब्िब्टश सरकार थराि उठी। ब्बरसा के साथी थे - गया म ण् ु डा, देयका म ण् ु डा,
पिाई म ण् ु डा, स न् ु दर म ण् ु डा, ब्तबु म ण् ु डा, जोहि म ण् ु डा, द ख
ि स्वांसी, हब्तराव म ण् ु डा
तथा ररसा म ण् ु डा आब्द। ये िोग 1895 से 1900 तक छोटा िागप र ु में अ ग्र ं ेजों की
प्रभ त ु ा को सदैव च ि ु ौती देते रहे। यह ब्वद्रोह बाद में 'ब्बरसा ब्वद्रोह' के िाम स
प्रब्सद्ध हुआ। इस आन्दोिि कें म ख् ु य के न्द्र ख ट ं ू ी था।
ब्वद्रोह म ख् ु य रूप से 'ब्बरसा म ण् ु डा' के िेत त् ृ व में 'म ण् ु डा' आब्दवाब्सयों क
द्वारा ब्कया गया था। परंपरागत रूप से प्रचब्ित साम ब् ू हक कृ ब्ष पर जागीरदारों,
ठे केदारों, बब्ियों, स द ू खोरों के शोषण के कारण ही यह ब्वद्रोह फूटा।
ब्बरसा म ण् ु डा िे 'उिग ि
ाि' की उपाब्ि िारण कर स्वयं को भगवाि का
द त ू घोब्षत कर ब्दया।
1899 ई. में ब्बरसा िे ब्क्रसमस की प व ू ि संध्या पर म ण् ु डा जाब्त का
शासि स्थाब्पत करिे के ब्िए ब्वद्रोह की घोषणा की थी।
16 । The Progress of Jharkhand (Monthly)
ब्बरसा म ड ुां ा