The Progress Of Jharkhand #46 | Page 15

ववशेष  िांजि प्रसन्हा आजादी की पहली लड़ाई: हूल क्रांति स थाि नायक प्रतिका मांी न प्रवप्लव’ अंग्रेजी सम्राज्य के ल्खिार् िि ा हप्रथयार उठाया था उसके बाद 1855 में संथािों ने अंग्रेजी इप्रतहासकारों ने संथाि हि को मुप्रक्त आंदोिन का दजाफ प्रदया है । हि को 1789 में अंग्रेजों के ल्खिार् हकुमत के ल्खिार् िंबी िि ाई िि ी। यू तो स्वतंत्रता संग्राम में वषफ 1857 की िि ाई ‘मीि का पत्थर’ साप्रबत हुई, मगर संथाि परगना क्षेत्र (वतफमान के ंारखंि राज्य का एक क्षेत्र) में यह िि ाई कार्ी पहिे शुरू हो गई थी। संथाि परगना में ‘संथाि हि’ गया था। कई अथो में समाजवाद के लिए पहिी िि ाई माना गया है। इसमें न केवि संथाि जनजाप्रत के लिए, बल्कक समाज के हर हूल क्राांब्त के नायक- ब्सद्धू व कान्हू मुम ष ू शोप्रषत वगफ के िोग प्रसद्धू और कान्ह के नेतृत्व में आगे आए। इस आंदोिन में शाप्रमि िोग गांव -गांव जाकर ‘हि’ का िोगों को प्रनमंत्रण दे ते थे। रांची प्रवश्वप्रवद्यािय के जनजातीय भाषा के िोर्ेसर उमेश चंा प्रतवारी कहते हैं , और ‘संथाि प्रवाोह’ के िारा अंग्रेजों को “30 जून 1855 को दाप्रमन-ए-कोह (संथाि परगना) में छे ि ा गया हि का संग्राम एक कान्ह दो भाइयों के नेतृत्व में 30 जून अलभयान हाप्रसि करने के लिए तमाम शोप्रषत-वंप्रचतों ने मुखर स्वर जान की कीमत दे कर भारी क्षप्रत उठानी पि ी थी। प्रसद्धू और 1855 को वतफमान साहेबगंज लजिे के भगनािीह गांव से इस प्रवाोह का िारंभ प्रवाोह का इप्रतहास मात्र नहीं है । यह दे श की आजादी का संभवत: पहिा संगप्रठत जन बुिंद प्रकया।” उन्होंने बताया प्रक इस संग्राम में संथाि आप्रदवाप्रसयों के साथ-साथ अन्य ग्रामीण प्रकया गया था। इस घटना की याद म समूह के िोगों ने बढ -चढ कर प्रहस्सा लिया। इन्हीं अथो में इसे यप्रद इप्रतहास के दो संगप्रठत संथाि परगना के भगनािीह म िॉ भुवनेश्वर अनुज की पुस्तक ‘ंारखंि के शहीद’ के मुताप्रबक, इस क्षेत्र म िप्रतवषफ 30 जून को ‘हि क्ांप्रत प्रदवस’ मनाया जाता है। वगो के टकराव के प्रनदे शक के रूप में देखा जाए, तो आज भी हि की िासंप्रगकता मायन रखती है। ” हि के मौके पर अंग्रेजों के ल्खिार् िोगों अंग्रेजों ने राजस्व के लिए संथाि, पहाप्रि यों तथा अन्य प्रनवाप्रसयों पर मािगुजारी िगा दी। छोि ो’ के नारे प्रदए गए थे। भगनािीह गांव दे नी पि रही थी। इस कारण यहां के िोगों में प्रवाोह पनप रहा था। ने ‘करो या मरो, ‘अंग्रेजो हमारी माटी में चुनका मुमूफ के घर जन्मे चार भाइयों प्रसद्धू , कान्ह, चांद और भैरव ने साथ प्रमिकर ‘संथाि हि’ यानी ‘संथाि इसके बाद न केवि यहां के िोगों का शोषण होने िगा था, बल्कक उन्हें मािगुजारी भी पुस्तक में लिखा गया है प्रक यह प्रवाोह भिे ही ‘संथाि हि’ हो परंतु संथाि परगना के समस्त गरीबों और शोप्रषतों िारा शोषकों, अंग्रेजों एवं उसके कमफचािरयों के प्रवरुद्ध स्वतंत्रता आंदोिन था। द प्रोग्रेस ऑफ़ झारखण्ड (माससक) । 15