The Progress Of Jharkhand #46 | Page 14

नमन एक सलामी इनके नाम: हेम द्र नाथ व ललली चक्रविी  रल्श्म चसह आ जादी बहत्तरवीं ंारखंि से भी रहा है , और इस स्वतंत्रता प्रदवस के दे शवाप्रसयों को बहुत- बहुत बधाई... दे खते देखते इतने वषफ गुजर करती हँ लजन्हें इप्रतहास में उप्रचत स्थान नहीं प्रमि सका है। वषफगांठ की की सभी गये। हर साि िाि प्रकिे की िाचीर स मौके पर उन सब शहीदों को श्रद्धांजिी अर्षपत यह अनकही कहानी है एक ऐसे दं पप्रत्त की हमारे तात्कालिक िधानमंत्री का राष्ट्र को लजन्होंने अपनी पूरी जजदगी स्वतंत्रता संग्राम में ंोंक कायों का िेखा जोखा और सैप्रनकों और कहानी है हेम ा नाथ चक्वती और लििी चक्वती की, लजन्हें अपने वैवाप्रहक जीवन के संबोप्रधत करना, बीते वषों में हुए प्रवकास स्वतंत्रता सेनाप्रनयों को सम्माप्रनत करना, ये सब हम दे खते आ रहे हैं बचपन से। वास्तव में हमारी आजादी बरकरार है तो वो हमारे सैप्रनकों की बदौित। आजाद हो दी और दशकों जेि की यातनाएँ सहीं। जी हाँ य ब्लली चक्रवती सातवें ही प्रदन अिगाव का सामना करना पड़ा जब हेम ा नाथ को "अथ्राबाड़ी मेि ऐक्शन कांि" के अलभयोग में प्रगरफ्तार कर लिया गया। तभी उनकी पत्नी ने भी नवप्रववाप्रहता का चोिा उतार कर स्वतंत्रता संग्राम की मशाि हाथों में िे कूद पड़ीं आंदोिन में। हेम ा नाथ को प्रगरफ्तारी के बाद प्रवलभन्न जेिों में रखा गया प्रर्र उन्हें कािा पानी की जाने के बाद भी अनेकों बार पड़ोसी दे शों सजा दे कर अंिमान के सेिुिर जेि में िाि प्रदया गया।पप्रत की प्रगरफ्तारी के बाद लििी जवानों ने अपने शौयफ और पराक्म स अंजाम दे ती हुईं 1941 के बांग्िादे श के चटगांव में हुए शस्त्रागार िूट कांि के प्रसिप्रसिे म िारा युद्ध की ल्स्थप्रत पैदा करने पर हमार उनको परालजत प्रकया है , पर इस क्म म जाने प्रकतने ही भारत माँ के नौप्रनहािों न चक्वती भी पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोिन में कूद पड़ीं। प्रवलभन्न क्ांप्रतकारी गप्रतप्रवप्रधयों को प्रगरफ्तार कर िी गयीं। उनकी प्रगरफ्तारी के छह साि बाद भारत तो आजाद हो गया पर वो 1952 तक वीरगप्रत पाई। हम सब दे शवासी उनके बांग्िादेश के बोरीशाि जेि में ही कैद रहीं। प्रर्र तत्कािीन राष्ट्रपप्रत िॉक्टर राजेन्ा िसाद वैसे ही जब हम स्वतंत्रता संग्राम के अप्रवभालजत प्रबहार के ंुमरीप्रतिैया (वतफमान में ंारखंि ) में जाकर बस गये।पर उनकी सदै व ऋणी रहेंग । े प्रकस्से सुनते हैं या पढ़ते हैं तो उनकी वतनपरस्ती और साहस पर हम दं ग रह जाते हैं। हमारे सैंकड़ों हजारों शूरवीरों न हंसते - हंसते खुद को मातृभूप्रम पर कुबाफन कर प्रदया था। उनमें से कुछ तो हमार सुनहरे इप्रतहास का प्रहस्सा बने और हम की पहि पर उन्हें कैद से आजादी प्रमिी।उनकी िरहाई के बाद वे और उनके पप्रत हेम ा नाथ मुसीबतें कम होने को न थीं। जेि में अत्यप्रधक यातनाएँ ंेिने के कारण हेम ा नाथ वहा आते ही र्ालिज़ के लशकार हो गये और अपना व अपने पप्रत के जीप्रवकोपाजफन की सारी लजम्मेदारी लििी चक्वती पर आ गयी। पर उन्होंने प्रहम्मत नहीं हारी और एक स्कूि म पढ़ाते हुए जोवन बसर करने िगीं। अंततः 1986 में हेम ा नाथ चक्वती की मृत्यु हो गयी और वे अकेिी रह गयीं। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी पर उन्होंने एक भांजे को गोद लिया भी पर वह आज भी उनकी जांबाजी को पढ़ सुनकर उनका हो न सका। पप्रत की मौत के बाद उनके एक सेवक सुभाष यादव ने जीते जी उनकी के मतवािे थे लजन्होंने अपना सवफस्व संस्कार प्रकया। गर्षवत होते हैं पर जाने प्रकतने ही ऐसे वतन आजादी की िड़ाई में ंोंक प्रदया पर प्रकन्ही वजहों से वो गुमनाम रह गये। पर उनके बलिदान के हम सदै व ऋणी हैं। ऐसे ही एक वतनपरस्त शहीद जोड़ी का थोड़ा सा पिरचय मैं आपसब स करवाना चाहुँगी, लजनका ताल्लुक हमार पूरी सेवा और दे खभाि की और चौबीस वषफ बाद जब उनकी मृत्यु हई तो उनका अंप्रतम दे श की आजादी की खाप्रतर अपना सब कुछ कुबाफन करने वािे ये दं पप्रत्त आजाद भारत में वषों जीए तो सही पर उनके योगदान को प्रबिकुि भुिा प्रदया गया। न ही जीते जी न मरणोपरांत कभी सरकार में बैठे नुमाइंदों ने उनकी कोई सुध िी। ये वाकई अर्सोसजनक है। जाने ऐसे प्रकतने ही योद्धा होंगे लजनकी शहादत पर आजाद भारत की नींव रखी गयी पर उनके योगदान को िेशमात्र भी सम्मान नहीं प्रमि सका। उन सब गुमनाम शहीदों को हमारा सिाम। 14 । The Progress of Jharkhand (Monthly) 