कवर स््टटोरी
सामेाजिक सम्मेान और संस््थागत अवसरों से पीलढ़यों तक वंचित रखा गया हो, तो उसे केवल कागज पर समेान अवसर दे देने से वास्तलवक समेानता पैदा नहीं हो सकती । इसी सोच के आधार पर संविधान ने अनुसूचित जालतयों, अनुसूचित जनजालतयों और सामेाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वगगों के लिए विशेष प्रावधानों का रास्ता तैयार किया ।
आरक्षण के वास्तलवक उद्ेश्य को समेझने के लिए पंडित गोविंद ब्किभ पंत और डलॉ. भीमेराव आंबेडकर के बीच हुई बताई जाने वाली एक चलचणात बातचीत का भी उ्किेख किया जाता है । इस प्रसंग मेें पंत की ओर से यह आशंका व्यक्त की गई ्थी कि यदि आरक्षण के मेाध््यम से लोगों को शासन और प्रशासन मेें अवसर दिया जाएगा, तो क्या इससे योग्यता और प्रशासनिक दक्षता प्रभावित नहीं होगी? इसके जवाब मेें डलॉ. आंबेडकर के विचार का सार यही बताया जाता है कि आरक्षण को केवल योग्यता- अयोग्यता के चश्मेे से देखना उचित नहीं है । इसका उद्ेश्य उन वगगों को शासन और संस््थाओं मेें प्रतिनिधित्व देना है, जो लंबे समेय तक
सामेाजिक पररल्स््थलतयों के कारण लनणणाय लेने की प्रलरिया से बाहर रहे । लोकतंत् मेें प्रतिनिधित्व स्वयं एक मेहत्वपूणणा मेू्कय है ।
इस प्रसंग का मेूल संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है । यदि समेाज के किसी बड़े हिस्से को यह दिखाई ही न दे कि शासन और सत्ा की संस््थाओं मेें उसके अपने समेुदाय के लोग भी मेौजूद हैं, तो केवल कानूनी समेानता उसके भीतर लोकतांलत्क विश्वास पैदा नहीं कर सकती । प्रतिनिधित्व नागररकों को यह विश्वास देता है कि राष्ट्र की व्यवस््था किसी एक वगणा की निजी संपलत् नहीं है । शासन मेें विविध सामेाजिक समेूहों की भागीदारी लोकतंत् को अधिक व्यापक और स्वीकायणा बनाती है ।
यहीं आरक्षण और योग्यता के बीच कृत्रिम संघषणा पैदा करने की राजनीति को समेझने की आवश्यकता है । आरक्षण योग्यता का विरोध नहीं है । आरक्षण प्रवेश और प्रतिनिधित्व का एक संवैधानिक मेाध््यम है । किसी पद या संस््थान मेें पहुंचने के बाद व्यल्क्त से उसकी जिम्मेेदारी, कायणा क्षमेता, प्रशिक्षण और जवाबदेही की अपेक्षा समेाप्त नहीं हो जाती । इसलिए यह कहना कि
आरक्षण अपने आप मेें अयोग्यता को बढ़ावा देता है, संवैधानिक व्यवस््था के उद्ेश्य को बहुत संकीणणा तरीके से देखना होगा ।
योग्यता भी केवल परीक्षा मेें प्राप्त अंकों का नामे नहीं है । अंक किसी विशेष परीक्षा मेें प्रदिणान का एक पैमेाना हो सकते हैं, लेकिन वे हमेेशा यह नहीं बताते कि प्रतियोगिता मेें शालमेि दो व्यल्क्तयों को जीवन मेें समेान अवसर लमेिे ्थे या नहीं । एक विद्यार्थी मेहानगर के संसाधन- संपन्न विद्यालय मेें पढ़ता है, उसके पास पुस्तकालय, तकनीकी साधन, निजी मेागणादिणान और आल्थथिक सुरक्षा है; दूसरी ओर कोई विद्यार्थी ऐसे क्षेत् से आता है जहां विद्यालय, शिक्षक, पुस्तकालय और आल्थथिक संसाधन सीलमेत हैं । दोनों से समेान परिणामे की अपेक्षा करने से पहले अवसरों की असमेानता को समेझना आवश्यक है ।
इसीलिए सामेाजिक न्याय की व्यवस््था का उद्ेश्य प्रतिभा को दबाना नहीं, बल््कक प्रतिभा को अवसर देना है । देश की वास्तलवक प्रतिभा केवल उन परिवारों मेें पैदा नहीं होती जिनके पास पीलढ़यों से शिक्षा और संसािनों की सुविधा
8 flracj 2026