September 2026_DA | Page 9

रही है । गांवों, छो्टे कस्बों, श्रलमेक परिवारों, वंचित समेुदायों और आल्थथिक रूप से कमेजोर परिवारों मेें भी असंख्य प्रतिभाएं जन््म लेती हैं । सवाल यह है कि क्या राष्ट्र उन प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर देता है ।
भारत का विकास भी इसी व्यापक दृष््टटिकोण से देखा जाना चाहिए । विकास केवल किसी एक वगणा की आवश्यकता नहीं है । सड़क, बिजली, अस्पताल, उद्योग, लडलज्टि सुविधाएं, वैज्ालनक अनुसंधान, कृषि विकास और रोजगार पूरे देश की जरूरत हैं । इसलिए विकास को आरक्षण के सामेने खड़ा करना ही गलत है । देश को विकास भी चाहिए और सामेाजिक प्रतिनिधित्व भी ।
यदि देश की अर््थव्यवस््था बढ़ती रहे लेकिन समेाज के कुछ वगणा उच्च शिक्षा, प्रशासन, सावणाजनिक संस््थाओं और लनणणाय लेने वाली संस््थाओं मेें लगातार कमेजोर प्रतिनिधित्व रखते हों, तो विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी । आल्थथिक विकास तभी स््थायी और व्यापक बन सकता है, जब उसके लाभ समेाज के विभिन्न वगगों तक पहुंचें और प्रत्येक नागरिक को यह मेहसूस हो कि राष्ट्रीय प्रगति मेें उसकी भी हिस्सेदारी है ।
आरक्षण को लेकर एक और मेहत्वपूणणा तथ्य यह है कि इसे केवल सरकारी नौकररयों के प्रतिशत तक सीलमेत करके नहीं देखा जा सकता । संविधान ने अनुसूचित जालतयों और अनुसूचित जनजालतयों के लिए संसद और विधानसभाओं मेें आरक्षित लनवाणाचन क्षेत्ों की व्यवस््था भी की है । इसका उद्ेश्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुलनल्श्चत करना है । इसका स्पष््ट संदेश है कि लोकतंत् केवल बहुमेत की संख्या नहीं, बल््कक वंचित और ऐतिहासिक रूप से कमेजोर समेूहों की आवाज को संस््थागत स््थान देना भी है ।
यदि केवल योग्यता ही लोकतांलत्क प्रतिनिधित्व का आधार होती, तो लनवाणाचन व्यवस््था की आवश्यकता ही नहीं होती । संसद और विधानसभाएं किसी प्रतियोगी परीक्षा से नहीं बनतीं । जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है क्योंकि लोकतंत् मेें प्रतिनिधित्व स्वयं एक मेू्कय है । इसलिए प्रशासनिक दक्षता और लोकतांलत्क प्रतिनिधित्व को एक ही पैमेाने से मेापना उचित नहीं है ।
आज आरक्षण के खिलाफ या उसके पक्ष मेें उठिने वाली आवाजों को भी इसी संवैधानिक
दृष््टटिकोण से समेझने की आवश्यकता है । आरक्षण का विरोध करना लोकतांलत्क अधिकार है । कोई व्यल्क्त आरक्षण की सीमेा, व्यवस््था, लाभ के वितरण, क्रीमी लेयर या समेय-समेय पर समेीक्षा की आवश्यकता पर सवाल उठिाता है तो उस पर चचाणा होनी चाहिए । किसी भी नीति को प्रश्नों से ऊपर नहीं रखा जा सकता । आरक्षण का विरोध किसी समेुदाय के प्रति घृणा या उसके अधिकारों को समेाप्त करने की मेांग मेें नहीं बदलना चाहिए । इसी तरह आरक्षण की मेांग भी दूसरे समेुदायों के प्रति शत्ुता का मेाध््यम नहीं बननी चाहिए । दोनों स््थथितियां समेाज मेें अविश्वास और तनाव पैदा कर सकती हैं ।
वर््तमान आरक्षण आंदोिनों को भी इसी कसौ्टी पर देखने की आवश्यकता है । आंदोलन लोकतंत् का हिस्सा हैं, लेकिन आंदोलन की दिशा ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे सामेाजिक सद्ाव और राष्ट्रीय एकता कमेजोर हो । आरक्षण के प्रश्न पर सड़क पर संघषणा करने से अधिक मेहत्वपूणणा है कि संविधान के दायरे मेें बैठिकर आंकड़ों, सामेाजिक स््थथिति और वास्तलवक प्रतिनिधित्व का अध्ययन किया जाए ।
flracj 2026 9