डॉ. भीमेराव आंबेडकर के चिंतन को समेझने के व्लए यह बात अत्यंत मेहत्िपूण्ग है कि वे केि्ल औपचारिक समेानता के समर््थक नहीं थे । वे जानते थे कि सवदयों से च्ली आ रही सामेाजिक वि्षमेता के बीच केि्ल यह कह देना कि सभी नार्रिक कानून की नजर मेें समेान हैं, पया्गप्त नहीं होर्ा ।
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रत जैसे विविधताओं से भरे देश मेें विकास केवल सड़क, बिजली, रोजगार और आल्थथिक वृलधि का नामे नहीं है । विकास का वास्तलवक अर््थ तब पूरा होता है, जब समेाज के प्रत्येक वगणा को यह विश्वास हो कि राष्ट्र की सत्ा, शासन-व्यवस््था, शिक्षा, रोजगार और लनणणाय-प्रलरिया मेें उसकी भी भागीदारी है । इसी दृष््टटि से आरक्षण को केवल नौकरी या शैक्षणिक संस््थानों मेें सीटोों की हिस्सेदारी के रूप मेें देखना उसके व्यापक संवैधानिक उद्ेश्य को छो्टा कर देना है । आरक्षण मेूलतः उन ऐतिहासिक असमेानताओं को कमे करने का मेाध््यम है, जिन्होंने लंबे समेय तक समेाज के कुछ वगगों को अवसरों और प्रतिनिधित्व से दूर रखा ।
आरक्षण पर बहस आज जिस तरह राजनीतिक नारों और सामेाजिक ्टकराव मेें बदलती जा रही है, वह चिंता का विषय है । किसी भी लोकतंत् मेें नीलतयों पर असहमेलत स्वाभाविक है, लेकिन जब सामेाजिक न्याय का प्रश्न समेुदायों के बीच संघषणा का कारण बनने लगे, तब राजनीति को अपनी भाषा और दिशा
डॉ. भीमेराव आंबेडकर के चिंतन को समेझने के व्लए यह बात अत्यंत मेहत्िपूण्ग है कि वे केि्ल औपचारिक समेानता के समर््थक नहीं थे । वे जानते थे कि सवदयों से च्ली आ रही सामेाजिक वि्षमेता के बीच केि्ल यह कह देना कि सभी नार्रिक कानून की नजर मेें समेान हैं, पया्गप्त नहीं होर्ा ।
दोनों पर पुनलवणाचार करना चाहिए । आरक्षण का सवाल किसी एक जाति बनामे दूसरी जाति का सवाल नहीं होना चाहिए । यह सवाल होना चाहिए कि भारत का लोकतंत् अपने प्रत्येक नागरिक को समेान अवसर और सम्मेानजनक प्रतिनिधित्व किस प्रकार सुलनल्श्चत करेगा ।
डलॉ. भीमेराव आंबेडकर के चिंतन को समेझने के लिए यह बात अत्यंत मेहत्वपूणणा है कि वे केवल औपचारिक समेानता के समे्थणाक नहीं ्थे । वे जानते ्थे कि सलदयों से चली आ रही सामेाजिक विषमेता के बीच केवल यह कह देना कि सभी नागरिक कानून की नजर मेें समेान हैं, पयाणाप्त नहीं होगा । यदि किसी व्यल्क्त को शिक्षा,
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