September 2026_DA | Seite 46

विश््ललेषण

दलित एवं पिछड़े िग्ट की मेदहिाएं भी पीछे नहीं रही स्वतंत्रता संग्राम मेें

ऊदा देवी पासी

दा देवी पासी, जिन्हें अंग्ेज अफसरों द्ारा ' ब्िैक ्टाइग्ेस ' की संज्ा दी गई, लखनऊ के पास उजिरियाँव गांव मेें पासी जाति से सम्बन्ि रखती थीीं । ऊदा अन्याय और अस्पृश्यता के प्रतिरोध मेें अपने जुझारू स्वभाव और प्रतिरोध के लिए जानी जाती हैं । ऊदा के पति मेक्का पासी अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पि्टन मेें सैनिक हुआ करते ्थे । अंग्ेजों के बढ़ते प्रकोप के कारण जब देशी रियासतों ने सुरक्षा दल बनाए तो वाजिद अली शाह ने भी मेहल की रक्षा के उद्ेश्य से ल्स्त्यों का एक सुरक्षा दल खड़ा किया । ऊदा भी एक सदस्य के रूप मेें इसका हिस्सा बनी । बहादुरी और तुरंत लनणणाय लेने की उनकी क्षमेता से नवाब की बेगमे और देश के प्र्थमे स्वािीनता संग्राम की नायिकाओं मेें से एक बेगमे हजरत मेहल उनसे अत्यलिक प्रभावित हुई । नियुल्क्त के कुछ ही समेय पश्चात ऊदा देवी को बेगमे हजरत मेहल की मेलहिा सेना की ्टुकड़ी का कमेांडर बना दिया गया ।
मेलहिा दस्ते के कमेांडर के रूप मेें ऊदा ने देश के प्र्थमे स्वतंत्ता संग्राम के दौरान जिस अदम्य साहस, दूरदलिणाता और शौयणा का परिचय दिया, उससे खुद अंग्ेज सेना भी चकित रह गई ्थी । ऊदा देवी को शौयणा और बलिदान की प्रेरणा अपने पति मेक्का पासी की शहादत से लमेिी ्थी । 10 मेई, 1857 को मेेरठि से प्रारम्भ रिांलत पूरे उत्र भारत मेें उस समेय जोरों पर ्थी । 10 जून, 1857 को लखनऊ के कस्बा चिनह्ट के निक्ट इस्मेाइलगंज मेें मेौलवी अहमेदउ्किाह शाह की अगुआई मेें संगलठित रिल्न्तकारी सेनालनयों
का हेनरी लॉरेेंस के नेतृत्व मेें ईस््ट इंडिया कंपनी की फौज के सा्थ युधि हुआ । चिनह्ट की इस ऐतिहासिक लड़ाई मेें रिांलतकाररयों की विजय हुई त्था हेनरी लॉरेेंस की फौज को मेैदान छोड़कर भाग खड़ा होना पड़ा । यह प्र्थमे स्वतंत्ता संग्राम की सबसे बड़ी उपिल्ब्ियों मेें से एक ्थी । देश को गौरवाल्न्वत करनेवाली उस लड़ाई मेें सैकड़ों दूसरे सैलनकों के सा्थ मेक्का पासी को भी वीरगति प्राप्त हुई । ऊदा देवी ने अपने पति के शव पर अंग्ेजों से बदला लेने और अपने पति की शहादत को अमेर करने की कसमे खाई । मेक्का पासी के बलिदान का प्रतिशोध लेने का यह अवसर ऊदा देवी को चिनह्ट के मेहासंग्राम की अगली कड़ी सिकंदरबाग की लड़ाई मेें लमेिा ।
अंग्ेजों की सेना चिनह्ट की पराजय से
बौखला गई ्थी । जब उन्हें पता चला कि लगभग दो हजार रिाल्न्तकारी सैलनकों ने लखनऊ के सिकंदर बाग मेें शरण ले रखी है तो 16 नवंबर, 1857 को कोलिन कैंपबेल के नेतृत्व मेें अंग्ेज सैलनकों ने सिकंदरबाग की घेराबंदी कर दी । ऊदा के नेतृत्व मेें वाजिद अली शाह की मेलहिा सेना की ्टुकड़ी भी इसी बाग मेें ्थी । असावधान सैलनकों की बेरहमेी से हत्या करते हुए अंग्ेज सैनिक तेजी से आगे बढ़ रहे ्थे । हजारों भारतीय सैनिक मेारे जा चुके ्थे । पराजय सामेने नजर आ रही ्थी । मेैदान के एक हिस्से मेें मेलहिा ्टुकड़ी के सा्थ मेौजूद ऊदा पराजय निक्ट देखकर पुरुषों का वेश धर हाथोों मेें बंदूक और कंिों पर भरपूर गोला बारूद लेकर पीपल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गई ।
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