September 2026_DA | Page 45

लोग स्वयं ईसाई मेतवाद और इतिहास के आलोचक हैं ।
यह बात और है कि यही पश््चचिमी जगत मेुस््ललिम देिों और समेाजों मेें चल रही कुरीलतयों पर न केवल चुप रहता है, बल््कक उन्हें इस्िामेी‘ संस्कृलत’ का अंग मेानकर उनका सम्मेान करता है । इस विरूपता पर प्रश्न न उठिाकर और हिंदू धर््म-समेाज के प्रति लमेथ्यारोपों का तथ्यपूणणा प्रतिकार न कर जब हिंदू प्रचारक पश््चचिम पर‘ श्वेत अहंकार’ या श्रेष््ठताबोध का आरोप लगाते हैं तो वह निष्िि बैठिता है और हिंदू धर््म-समेाज के प्रति पश््चचिमी दुराग्ह य्थावत बना रहता है ।
औपनिवेशिक युग बीतने के बाद आज भी वही पुराने आरोप लगाने से यही लगता है कि हिंदुओं के पास बचाव मेें कहने को कुछ ठिोस नहीं है । इसीलिए भारत मेें जाति-भेद पर पश््चचिमी चिंताओं को नस्िवाद कहना आत््म-प्रवंचना बनकर रह जाता है । ऐसे मेें हिंदू प्रचारकों को लफ्िाजी के बजाय पश््चचिमी विमर््श के तथ्यगत प्रतिकार का दायित्व लेना होगा । पश््चचिमी बुलधिजीवी हिंदुओं को जातिवादी यानी एक प्रकार का नस्िवादी मेानते हैं कि उनमेें जन््म-जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना होती है । लिहाजा वे निंदा के पात् हैं । जातिगत भेदभाव उन्हें गुलामेी या रंगभेद से भी अधिक रिूर और अमेानवीय लगता है ।
हिंदुओं की जाति प्र्था के बारे मेें उनके भीतर यही धारणा है कि उच्च जाति के हिंदू निम्न जालतयों के प्रति बेपरवाह हैं । यहां तक कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव कानूनी रूप से खत््म होने के बावजूद यह धारणा कायमे है । पश््चचिम को यही गलतफहमेी है कि मेदर ्टेरेसा ने ही हजारों अभागे, उपेक्षित, वंचित और अना्थ भारतीय बच्चों का उधिार किया, जो उच्च जाति के हिंदुओं ने नहीं किया । ऐसी गढ़ी गई छवि का प्रतिकार केवल और केवल कोरे आरोप लगाने से नहीं हो सकता ।
हिंदू प्रचारक दूसरी बुनियादी गलती चचणा- लमेिनरी गतिविधियों और उनके हिंदू-विरोधी प्रचार का ठिीकरा‘ विदेशियों’ पर फोड़कर करते हैं । यह भी पुरातन मेानसिकता है । आज भारत
मेें लगभग सारी चचणा गतिविधियां देसी ईसाई चला रहे हैं( बल््कक भारत, कोरिया और फिलीपींस के ईसाई अब अंतरराष्ट्रीय चचणा संस््थाओं के नेतृत्व मेें बढ़ रहे हैं)। देसी मेीडिया और विश्वलवद्याियों मेें पूरा हिंदू विरोधी प्रचार भारतीय पत्कार और अकादलमेक चलाते आए हैं । ब्ाह्मणों और हिंदू शास्त्ों के विरुधि अनगणाि प्रलाप भारतीय नेता ही करते हैं । उसे‘ गोरे विदेशियों’ की शरारत कहने से कुछ नहीं होने वाला ।
भारतीय बौलधिकों और नेताओं मेें हिंदू धर््म और अन्य िमेगों के बारे मेें गंभीर भ्रातियां पैठि कर चुकी हैं । जो बातें पश््चचिम कहता है, वे किसी न किसी रूप मेें भारतीय बौलधिकों और नेताओं द्ारा भी कही जाती हैं । भारतीय वामेपंथियोों, सेक्युिरवालदयों, गांधीवालदयों, नव-आंबेडकरवालदयों और देसी ईसाई शैक्षिक संस््थाओं ने ही हिंदू धर््म-समेाज के बारे मेें तमेामे भ्रामेक बातों का प्रचार किया । ऐसे मेें हिंदू प्रचारकों द्ारा पश््चचिमी चिंताओं को‘ नस्िवाद’ कहना व्य्थणा है । उन्हें देखना चाहिए कि पश््चचिम मेें अश्वेत बुलधिजीवी और संस््थान भी हिंदू समेाज को जातिगत नस्िवादी मेानते हैं । अ्थाणात पश््चचिम मेें हिंदू समेाज के प्रति सवणासम््मत दुराग्ह हैं । नि: संदेह, विदेशी चचणा-लमेिनरी संस््थान इस वैचारिक दुष्प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं, क्योंकि चतुर और सजग होने के सा्थ ही उनका दृष््टटिकोण भी स्पष््ट है ।
उन्होंने दिकों से बौलधिक-शैक्षिक कायणा एवं प्रचार पर बहुत परिश्रमे करने के सा्थ ही संसाधन
भी लगाए हैं । इसका ही परिणामे है आज स्वयं भारतीय, जिनमेें बड़ी संख्या मेें हिंदू लिबरल- वामेपं्थी-राष्ट्रवादी भी वही सब दोहराते हैं, जो लमेिनरी चाहते हैं । अतः इसका दोष बाहरी लोगों पर मेढ़ना व्य्थणा है, जब विगत सात दिकों से भारत की राजनीतिक-शैक्षिक व्यवस््था पूरी तरह हिंदू सत्ािाररयों के हा्थ मेें है । यदि अपने ही धर््म, समेाज, संस्कृलत और इतिहास के बारे मेें हिंदू शासकों-बौलधिकों ने अपने ही देश मेें तमेामे भ्रांलतयों को फैलने दिया तो विदेशियों पर दोषारोपण
हमेारी दोहरी मेूढ़ता दिाणाता है । यह समेझना होगा कि राजनीतिक या दलीय वचणास्व से बौलधिक- सांस्कृलतक प्रभुत्व नहीं बनता ।
सवणाप्र्थमे, भारत मेें जातिप्र्था की जल्टि सच्चाई और इतिहास का गहन शोध और तदनुरूप उसकी व्यापक शिक्षा दी जानी चाहिए ्थी, जो नहीं दी गई । दूसरे, समेाज को जातिगत पूवाणाग्हों से मेुक्त करना भी जरूरी ्था, जबकि नेताओं ने उसे सस्ती राजनीति का जरिया बना लिया । तीसरे, ईसाई लमेिनरी प्रचार के प्रतिकार के लिए सभी िमेगों-पंथोों की मेूल किताबों और विचारों को ठिोस गंभीर विषय के रूप मेें स््थालपत करना जरूरी ्था, जिससे ईसाइयत के दावों का खोखलापन स्पष््ट दिखाया जा सके । उि्टे यहां सेक्युिरिज््म त्था सवणािमेणा समेभाव की विकृत समेझ मेें सभी दिों ने हिंदू-विरोधी मेतवादों को ही मेजबूत किया । अतः जब तक इन तीनों कतणाव्यों को पूरा न करें, तब तक स्वदेश या विदेश मेें हिंदू-विरोधी दुराग्हों को खत््म करना असंभव है । �
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