विश््ललेषण
जातिप्रथा पर दुष्प्रचार
की कार् जरूरी
शंकर शरण
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मेेरिका के सिए्टि मेें जातिगत भेदभाव के विरुधि अपनी तरह का एक पहला कानून बना है । चूंकि जाति के मेुद्े का मेूल स््थान भारत है तो यहां भी उस पर चचाणा हो रही है । कुछ लोग इसे ऐतिहासिक कदमे बता रहे हैं, तो कुछ हिंदू-विरोधी प्रचार का एक रूप मेान रहे । वस्तुतः, अमेेरिका-यूरोप मेें हिंदू धर््म की पहचान मेुख्यतः जातिगत उत्पीड़न से जुड़ गई है । इस दुष्प्रचार का आरंभ सलदयों पहले ईसाई लमेिनररयों ने किया, जिसे कालांतर मेें भारतीय वामेपंथियोों ने नई धार दी ।
ब्रिटिश पत्कार मेाक्क ्टिी का कहना है कि मैैं जब कहीं भी हिंदू धर््म के बारे मेें कोई अच्छी बात बताता हूं, तो कोई न कोई श्रोता आपलत् करता है कि जातिप्र्था के कारण हिंदू धर््म खराब है । ऐसा समेझने वाले प्रायः सुशिक्षित लोग हैं । वे जातिप्र्था को हिंदू धर््म का मेूल तत्व समेझते हैं । इस पर आमे हिंदूवादी प्रचारक केवल पश््चचिमी बौलधिकों को यही आईना दिखाते हैं कि चूंकि पश््चचिम ने सलदयों तक विश्व मेें अंतहीन अत्याचार किए, इसलिए उन्हें हिंदू समेाज पर अंगुली उठिाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं । उनकी यह दलील लनष्प्रभावी रहती है, क्योंकि पश््चचिमी
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