लमेिेगा । बदले मेें अंग्ेज सरकार को एक ऐसी जमेात लमेिती । जो दिखने मेें तो हिंदुस्तानी होती । मेगर अंग्ेज सरकार की हर सही या गलत नीति का समे्थणान अंधभक्त के समेान करती । जो किसी भी स््थानीय विद्रोह मेें अपने ही हिंदुस्तानी भाइयों के विरुधि अंग्ेजों का सा्थ देती । जो अपने हिंदुस्तानी भाइयों को नीचा और अंग्ेजों को उच्च समेझती । इससे अंग्ेजी राज सदा के ले लिए उस देश मेें राज दृढ़ हो जाता ।
इस प्रकार से ईसाई चचणा, अंग्ेज सरकार और अंग्ेज व्यापारी तीनों को हर प्रकार से लाभ होता ।
वर््तमान मेें भी चचणा ऑफ़ इंग्िैंड का करोड़ोों पौर्ड बहुराष्ट्रीय कंपलनयों मेें लगा हुआ है । चचणा कंपलनयों के मेाध््यम से जिन देिों मेें धन कमेाता है, उन्हीं देिों को उन्हीं का धन चचणा मेें दान के नामे पर वापिस भेजता है । इसे कहते है " मेेरा ही जूता मेेरे ही सर " विदेशी सोच वाले विदेशी का तो भला हो गया मेगर हमेारे लनिणान, अशिक्षित, वंचित देशवालसयों को क्या लमेिा । यह चिंतन का विषय है । काले अंग्ेज बनने और गले मेें रिास ्टांगने के पश्चात वनवालसयों की जीवन शैली मेें व्यापक अंतर आया । पहले वह स््थानीय भूदेवताओं, वन देवताओं आदि को मेानते ्थे । अब वो ईसा मेसीह को मेानने लगे । वनवालसयों मेें शिक्षा चाहे कमे ्थी । मेगर धालमेणाक सदाचार उनकी जीवन शैली का अभिन्न अंग ्था । भूदेवता कहीं रुष््ट न हो जाये, इसलिए
अशिक्षित आदिवासी पाप-पुर्य का विचार करता ्था । भूदेवताओं के नाराज होने से प्राकृतिक विपदा न आये । इसलिए वह किसी को सताने मेें विश्वास नहीं रखता ्था । भूदेवताओं का भय ईसाई बनने के सा्थ समेाप्त हो गया । उसके स््थान पर पाप क्षमेा होने की मेान्यता प्रचलित हो गई । सारा दिन पाप करो और सांय जाकर चचणा मेें पापों को स्वीकार कर लो । सभी पाप क्षमेा हो जायेंगे । अच्छा तरीका लमेि गया । ईसाई बने आदिवालसयों मेें बड़ी तेजी से व्यलभचार, शराब आदि नशे की लत, कुल्टिता, झूठि-फरेब,
तलाक आदि फैल गए । उत्र पूवणा भारत इस परिवतणान का साक्षात प्रमेाण है । वहां शिक्षा तो है मेगर सदाचार नहीं है । आदमेी निकम्मेे हो चले है क्योंकि नशे ने उनका जीवन बबाणाद कर दिया है । जबकि औरतें परिवार का पे्ट पालने के लिए अकेले संघषणा कर रही है । ऐसे मेें ्टू्टते परिवार, घरेलू झगड़े, विवाद आदि ने समेाज को हिला कर रख दिया है ।
मेगर ईसाई चचणा को इससे कोई िक्क नहीं पड़ता । क्योंकि उसका राजनीतिक हित सुरक्षित है । सारा ईसाई समेाज संगलठित होकर पादरी के कहने पर वो्ट करता है । इसलिए चुनावी मेौसमे मेें राजनेता पादररयों के घरों के चक्कर लगाते आसानी से दिख जाते है । कुल लमेिाकर विदेश मेें बैठिे ईसाई पोप अपनी हिंदुस्तान पादररयों की फौज की सहायता से न केवल राजसत्ा को
लनददेश करते है, अपितु स््थानीय सरकार मेें दखल देकर अपने हित के कानून भी बनवाते है । नागा समेस्या आदि इसी सुनियोजित रणनीति का भाग है । स््थानीय वनवालसयों का जीवन ईसाई बनने से नरकमेय हो गया है । उसने सदाचार के बदले केवल व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर ली । मेगर ईसाइयत ग्हण कर उसने अपना मेूल-धर््म, अपनी सभ्यता, अपने पूवणाजों का अलभमेान, अपनी मेानसिक स्वतंत्ता, अपनी संस्कृलत, अपनी भाषा, अपनी जीवन शैली, अपना गौरवाल्न्वत इतिहास, अपनी धर््म खो दिया ।
हिन्दू समेाज का कतणाव्य ऐसी परिवेश मेें अत्यंत मेहत्वपूणणा है । हिन्दू समेाज ने कुछ अना्थालय, शिक्षा के लिए विद्यालय तो अवश्य खोले मेगर वह अ्कप होने के कारण प्रभावशाली नहीं ्थे । हिन्दू समेाज मेें संगठिन न होने के कारण कोई भी हिन्दू नेता शुलधि कर परिवलतणात वनवालसयों को वापस शुधि करने मेें प्रयासरत नहीं दिखता । हिन्दू समेाज के िमेाणाचायणा मेठिाधीश बनकर मेौज करने मेें अधिक रुचि रखते है । ऐसी समेस्याओं पर विचार करने का उनके पास अवकाश नहीं हैं । हिन्दू समेाज का धनी वगणा धर््म के नामे पर दिखावे जैसे तीर््थ यात्ा, साईं संध्या, विशालकाय संगमेरमेर लगे मेंदिर, स्वणणा और रत्न जलड़त मेूलतणायों मेें अधिक रुचि रखता है । जमेीनी स्तर पर लनिणान हिंदुओं का सहयोग करने का उसे कोई िमेाणाचायणा मेागणादिणान नहीं करता । एक अन्य हिन्दू समेाज का धनी वगणा है जिसे मेौज-मेस्ती सैर सपा्टे से फुरसत नहीं लमेिती । इसलिए ऐसे ज्विंत शील मेुद्ों पर उसका कोई ध्यान नहीं है । इस व््यथा का मेुख्य कारण ईसाई समेाज द्ारा संचालित कान्वें्ट स्कूिों मेें लमेिी शिक्षा है । जिसके कारण वे लोग पूरे सेक्युिर होकर निकलते है । ईसाइयों ने वनवासी समेाज का नाश केवल भारत मेें ही नहीं किया । एशिया, अफ्ीका, लैल्टन अमेेरिका सभी स््थानों पर अपनी चतुर रणनीति, दूर दृष््टटि, सुनियोजित प्रयास, एक दिशा, संगलठित होने के कारण पूरे विश्व पर आधिपत्य बनाया है । हमेने समेय रहते इस रणनीति से सीख ली होती तो आज हमेारे देश के वनवासी मेानसिक गुलामे और विदेशियों की कठिपुतली नहीं बनते । �
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