September 2026_DA | Page 38

ईसाई बने आदिवावसयों मेें बड़ी तेजी से व्यवभचार, शराब आदि नशे की ्लत, कुवट्लता, झूठ-फरेब, त्लाक आदि फै्ल र्ए । उतिर पूि्ग भारत इस पररित्गन का साक्षात प्रमाण है ।

विश््ललेषण

आदिवासी समेाज और ईसाइयोि

ईसाई बने आदिवावसयों मेें बड़ी तेजी से व्यवभचार, शराब आदि नशे की ्लत, कुवट्लता, झूठ-फरेब, त्लाक आदि फै्ल र्ए । उतिर पूि्ग भारत इस पररित्गन का साक्षात प्रमाण है ।
डॉ. विवेक. आय्ग

भा

रत जैसे बड़े देश मेें करोड़ोों लोग वन क्षेत् मेें सलदयों से निवास करते है । कुछ लोग उन्हें आदिवासी कहते है क्योंकि उनका मेानना है कि आदिकाल मेें सबसे प्र्थमे जनजाति इन्हीं के समेान ्थी । कालांतर मेें लोग विकसित होकर शहरों मेें बसते गए जबकि आदिवासी वैसे के वैसे ही रहे । हमे इसे भ्राल्न्त मेानते है । इसलिए आदिवासी के स््थान पर वनवासी उपयुक्त शब्द है । भारत मेें अधिकांश वनवासी समेाज झारखर्ड, छत्ीसगढ़, उड़ीसा, मेध्य प्रदेश, बिहार, बंगाल और पूववोत्र आदि राज्यों मेें रहते हैं । यह जनता अत्यंत लनिणान, शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा आदि सुविधाओं से वंचित हैं । भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी विकास से कोसो दूर है । ऐसे मेें ईसाई लमेिनररयों के लिए अत्यंत उपजाऊ खेत है, जिसमेें ईसा मेसीह की खेती करी जा सके । यह स््थथिति आज एकदमे से नहीं बनी है । इसे अत्यंत सुनियोजित रूप मेें अंग्ेज सरकार, ईसाई चचणा और अंग्ेज व्यापाररयों ने लमेिकर पिछले 200 वषगों मेें लनलमेणात किया ।
1857 मेें प्र्थमे संघषणा के असफल होने के पश्चात हज़ारों कारण हज़ारों रिांलतकाररयों ने जंगिों को अपना घर बनाया और छापे-मेार युधि के मेाध््यम से अंग्ेजों और उनके खुशामदियोों को बेचैन करने लगे । अंग्ेजों ने तंग आकर 1871 मेें लरिलमेनल ट्राइब्स एक््ट के नामे से
कानून बनाकर वनवासी सत्याग्ालहयों को ठिग, लु्टेरा आदि घोषित कर दिया । वनवासी प्रमेुखों को उनके क्षेत् से बाहर जाने की मेनाही कर दी और हर वनवासी को प्रति सप्ताह स््थानीय ्थाने मेें जाकर हाजिरी लगाने के लिए बाध्य कर दिया गया । सरकार का जिसका मेन होता उसे जेल मेें डाल देती अ्थवा फांसी से ि्टका देती । अंग्ेजों के इस अत्याचार का विरोध मेध्य भारत मेें बिरसा मेुंडा और बांसवाड़ा, राजस््थान मेें गोविन्द गुरु जैसे मेहानायकों ने किया । सरकार का इस दमेन नीति के पीछे दो उद्ेश्य ्थे । पहला 1857 की रिांलत को दोबारा न होने देना दूसरा ईसाई लमेिनररयों के लिए उपजाऊ जमेीन तैयार करना ।
वनवासी समेाज मेें गरीबी पहले से ही ्थी । ऊपर से अंग्ेजों के कुप्रबंधन के कारण अकाल, प्िेग आदि प्राकृतिक विपदा ने भारतवालसयों की कमेर ही ्टू्ट गई । वनवासी इलाकों मेें ईसाई लमेिनररयों ने शिक्षा, चिकित्सा, नौकरी आदि की आड़ मेें पैर पसारने आरम्भ कर दिए । सरकार ने ईसाई लमेिनररयों की सहायता के लिए यह घोषणा कर दी कि जो कोई लनिणानों की सेवा करेगा, उसे सरकारी अनुदान दिया जायेगा । य्थार््थ मेें यह अनुदान केवल चचणा और उससे सम्बंलित ईसाई संस््थाओं को दिया जाता ्था । इस अनुदान के दमे पर चचणा प्राकृतिक विपदा मेें अना्थ हुए बच्चों को गोद लेता ्था और विधवाओं को आश्रय देता । इन सभी को चचणा िमेाणान्तरित कर ईसाई पादरी अ्थवा प्रचारक बना देता । इनका कायणा विभिन्न
जंगली इलाकों मेें जाकर अपने समेान देखने वाले आदिवालसयों को ईसाई बनाना ्था । चचणा को अनुदान देने के लिए सरकार को धन व्यापारी वगणा मेुहैया करवाता ्था ।
अंग्ेज व्यापाररयों की नीति बड़ी सुनियोजित ्थी । चचणा उनके लिए ईसाई िमेाणान्तरण करेगा । िमेाणान्तरित व्यल्क्त का केवल धर््म परिवतणान ही नहीं होगा । उसकी सोच, भाषा, संस्कृलत, जीवन का उद्ेश्य, जीवन शैली सब कुछ परिवलतणात हो जायेगा । िमेाणान्तरित होने वाला व्यल्क्त हिंदुस्तानी धोती-कुताणा के स््थान पर अंग्ेजी पें्ट और जूते पहनेगा । सर पर है्ट लगाएगा । अंग्ेजी पुस्तकें पढ़ेगा और अंग्ेजी मेें बोलेगा । इन सभी उत्पादों का उत्पादन अंग्ेज व्यापारी करेगा । इस प्रकार से अंग्ेज व्यापाररयों को अपना सामेान बेचकर लाभ कमेाने के लिए समेुचित चिरस््थायी बाजार
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