September 2026_DA | Seite 37

जो समेानता, बंधुता व स्वतंत्ता जैसे जनतांलत्क मेू्कयों पर आधारित है ।
दलित विषयक साहित्य का समेाज बोध पाठिक और श्रोता की चेतना एवं अनुभूति को प्रभावित करनेवाली गहन संवेंदना से ही पूरा होता है । साहित्य पर समेय और समेाज का स्पष््ट प्रभाव
होता है । साहित्या की रचनाओं मेें मेनुष्य की मस््ततिष्क पर पड़नेवाले जीवन और जगत की घ्टना और ल्स््थलतयों का ही प्रतिबिंब होता है । दलित विषयक साहित्य की मेान्यता है कि कला या साहित्य को सामेाजिक दायित्व का लनवाणाह करते हुए कला सृजन मेें आगे बढ़ना चाहिए । इस दृष््टटि से दलित विषयक साहित्य शुधि कला न होकर एक सामेाजिक आंदोलन है ।
हिंदी दलित विषयक उपन्यास यह सामेाजिक सरंचना की तह मेें जाकर पूरे समेाज की न केवल पड़ताल करता है बल््कक उसमेें छुपी हुई विसंगलतयों को उजागर कर उसके प्रतिकार और परिष्कार का प्रयत्न भी करते हैं । सुअरदान उपन्यास मेें यह देख सकते है,“ तीन बेटियोों का मेानना ्था आदमेी जाति से नहीं बल््कक कर््म से बड़ा होता है । जातिवाद, ऊँच-नीच की भावना समेाज मेें यह कोढ की तरह है । यदि इसका इलाज न किया गया तो पूरा समेाज रोगी बन जायेगा ।” भारतीय संदभणा मेें यह वणणा-व्यवस््था
का विरोध करके समेरस समेाज के सा्थ-सा्थ मेानव मेात् की गररमेा को स््थालपत करना चाहता है । सामेाजिक संकीणणाता और विसंलगतों से मेानव मेात् को मेुक्त करना त्था दलित पीलड़त मेानवता को समेानता व सम्मेान दिलाना ही इस उपन्यास का उद्ेश्य हे । इसलिए प्र्थमेत: और अंतत: भी इसके लक्षय और सरोकार समेाजबोध ही है ।
छप्पर उपन्यास मेें चंदन ने अगला सवाल किया –“ तो इसका मेतलब यह हुआ कि तुम्हारी जो आज दीन-हीन हालत है, तुमे जो रोजी-रो्टी के लिए दूसरों के मेुंहताज हो और तुमेको नीच, अछूत या हेय मेानकर दूसरे लोग तुमेसे जिस प्रकार घृणा और उपेक्षा का व्यवहार करते है, तुमे जो शोषण, अपमेान और अत्याचार के शिकार हो इस सबका कारण ईश्वर है वहीं तुम्हारी दूदणािा कर रहा है ।” सलदयों के शोषण, प्रताड़ना, द्ेष और वैमेनष्य के भेदभाव तले दबा दलित समेाज भारतीयों की सांस्कृलतक विरासत और समेाज व्यवस््था को आज इसी दृष््टटि से देखता है । इस समेाज की जो दशा हुई है यहाँ की धालमेणाक परंपरा, ईश्वर का डर यही बात इस उपन्यास चंदन समेाज के सामेने रखता है । इतिहास मेें ऐसे अनेक घ्टनाएँ घल्टत हुई है जिनके पीछे जाति ने गहरी साजिश रची है । देश और समेाज के विघ्टन मेें भी मेहत्वपूणणा भूलमेका निभाई है । जब-जब भी बाहरी आरिांताओं से समेुच्चय देश को एकसा्थ लमेिकर ्टकराने की जरुरत पड़ी, जाति मेें ब्टाँ समेाज एकसा्थ जूडने मेें असमे्थणा ही दिखाई दिया और देश को लगातार पराजयों का मेुँह देखना पड़ा । इन पराजयों से भी हमेने कुछ नहीं सीखा क्योंकि देश से बड़ा जातीय गौरव ्था । जिस भ्रमे ने इस देश को हजारों साल गुलामे बनाकर रखा । देश को गुलामे बने रहना मेंजुर ्था लेकिन जाति को छोड़ना या इसे छोड़ना धर््म का हिस्सा ्था, जिसे विद्ान ईश्वरीय आदेश लसधि करने मेें लगे हुए ्थे ।
दलित उपन्यास इन सबके विरोध खडे है । वो भारतीय समेाज मेें समेता व स्वतंत्ता का पक्षधर है । मेनुष्य की अस््ममिता एवं सम्मेान को सववोपरि मेानता है । भारतीय समेाज व्यवस््था को दलितों की विपन्नता, निरक्षरता, सामेलजक
उत्पीड़न, विद्ेष, हीनताबोध, गरीबी, दुख का कारण मेानता हैं । क्योंकि भारतीय समेाज व्यवस््था ने दलितों पर लसि्क अस्पृश्यता ही नहीं ्थोपा बल््कक उनपर कडे और कठिोर दंड भी लागू किए । जिसे धर््म, सत्ा और साहित्य ने अपना समे्थणान दिया ।
मेुल्क्तपवणा यह सामेाजिक उपन्यास है । इसमेें दलित जीवन का लचत् है, दलित जीवन की विसंगति और समेस्याएँ है और दलित शोषण- उत्पीड़न की व््यथा क्था है ।“ भई म्हारा इक्किे का छोरा ्थोडा ही है सुनीत तो सारी बस्ती का हो गया है अब ।” सुनीत ने समेाज मेें व्याप्त जातिभेद देखा ्था और उसके विरोध मेें आवाज भी उठिाई ्थी । प्रा्थलमेक पाठििाला मेें पढ़ते समेय वो पुस्तक मेें छपे लचत् पर शंका प्रक्ट करते हुए पूछता है प्याऊ पर बैठिा आदमेी नलकी से दूर से दलितों को पानी पिलाता है । इस लचत् मेें नलकी क्यों नहीं है? सुनीत बच्चों और मेास््टरजी के सा्थ प्याऊ पक जाकर पंडितजी को ललकारता है और नलकी खींचकर िेंक देता है । छो्टे बच्चे का इतना साहस और पोलिस का भय देखकर वह सुनीत की बात से सहमेत हो जाता है । आजादी लमेिने के पाँच-छह बरस बितने के समेय के सामेाजिक वातावरण के लेखक ऐसी क्कपना कर सके कि पाँच-छह का दलित बालक भी पंडित को भयभित करे उसे जातिभेद मेानने से रोक सकता है । इसे आजादी के पवणा के सा्थ दलितों का मेुल्क्तपवणा ही मेानना चाहिए । यही बालक एक दिन पूरे बस्ती के लिए लड़ता है । यह समेाजबोध मेुल्क्तपवणा उपन्यास मेें दिखाई देता है ।“ दलित उपन्यास ही लोगों का संस्कृलत विमर््श और सामेाजिक ऐतिहासिक पड़ताल है इसलिए इसकी सामेाजिकता और सामेाजिक प्रतिबधिता पारंपारिक साहित्य से लब्ककुि अलग दिखाई पड़ती है ।“ इस प्रकार हिंदी दलित उपन्यास का इतिहास एवं समेाज बोध मेुख्यिारा से लब्ककुि भिन्न है । वो मेानवीय श्रमे को ही सौंदयणा और व्यवस््था की अन्यायपूणणा विसगंलतयों से मेुल्क्त को ही अपना सामेाजिक सरोकार और अपनी समेाजिकता मेानता है उसके केंद्र मेें केवल और केवल मेनुष्य व मेनुष्यता है । �
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