September 2026_DA | Page 25

मेृत्तव, अस्पृश्य दलित समेाज मेें भगवान बुधि के पश्चात कई शताल्ब्दयों तक कोई एक अकेला ऐसा सामेाजिक चिंतक भारत मेें नहीं अवतरित हुआ, जिसने इन त्थाकल्थत लसधिांतों का खंडन किया हो । हजारों वषगों से शोषित, पीलड़त, दलित, अछूतपन, शासक-पोषक, सवणणा वगगों के जघन्य एवं अमेानवीय शोषण, दमेन, अन्याय के विरुधि छो्टे-मेो्टे संघषणा को संगलठित रूप देने का कायणा सवणाप्र्थमे अद्भुत प्रतिभा, सराहनीय निष्ठिा, न्यायशीलता, स्पष््टवादिता के धनी बाबा साहब युगपुरुष डलॉ. भीमेराव अंबेडकर जी ने किया । आप ज्ान के भंडार और दलितों एवं शोलषतों के मेसीहा बनकर भारतीय समेाज मेें अवतरित हुए । आपने दलितों एवं शोलषतों को समेाज मेें सर ऊंचा कर बराबरी के सा्थ चलना सिखाया । आप ऐसे समेाज की केवल क्कपना ही कर सकते हैं, जब हमेारे पुरखों मेें से कुछ को इनसान जैसी शक्ि-सूरत होने के बावजूद, उन्हें सवणणा समेाज इनसान नहीं समेझता ्था । ऐसे समेाज के प्रति बाबा साहब ने स्वल्स्तत्व की सामेथ्यणा, अस््ममिता एवं रिांलत की आग जलाई जिससे सामेाजिक न्याय प्राप्त के लिए अनेक दलित-शोषित कायणाकताणा आत््मबलिदान के लिए उनके सा्थ खड़े हो गए ।
परंपरावादी व्यवस््था( वैदिक संस्कृलत) के कारण हजारों वषगों से कुचले गए समेाज के लोग आज ' दलित ' संज्ा से जाने जाते हैं और उनके विरोध का प्रमेुख कारण वणणा-धर््म है । कर््म श्रेष््ठ न होने पर भी जाति के नामे से श्रेष््ठ कहलाने वाला व्यल्क्त या समेाज अपने आप मेें एक धोखा है । विश्व की सभ्यता और संस्कृलत मेें ऐसा कहीं भी देखने को नहीं लमेिेगा कि व्यल्क्त को एक बार स्पिणा होने से छूने वाला व्यल्क्त अपलवत् हो जाए । भारत मेें अस्पृश्यता के इस जादुई लसधिांत का कोई तालक्कक जवाब किसी समेाजशास्त्ी के पास अभी तक उपलब्ि नहीं है । यह अनूठिा और बेलमेसाल लसधिांत पूणणातया षड्ंत् और बेईमेानी के अलावा कुछ नहीं दिखता है । जीवन की इन दग्ि एवं करुण ल्स््थलतयों से उबरने के लिए दलित साहित्य के मेाध््यम से दलित अपनी अस््ममिता को पहचानने का प्रयास कर रहा है-
दलित कौन है, उसकी स््थथिति क्या ्थी? उसकी इस स््थथिति के लिए कौन उत्रदायी है, उनकी संस्कृलत क्या ्थी? उसके पूवणाज कौन ्थे? यह चिंतन ही दलित साहित्य के प्रमेुख विषय हैं । दलित समेुदाय के बहुजन( करोड़ों) लोग आयणा हिंदुओं से सामेाजिक न्याय की आशा लगाए हुए हैं, परंतु िमेाांधता और असमेानता के पक्षधर ये लोग समेानता के चिंतन को ताक मेें रख देते हैं । आज देश मेें करोड़ों लनिणान, अनपढ़, बेरोजगार दलित व्यल्क्त अपनी अस््ममिता की तलाश मेें भ्टक रहे हैं । गिरिराज किशोर के शब्दों मेें कहें तो भारतीय समेाज, खासतौर से जातीय हिंदू समेाज, जिसके कारण देश मेें दालित पनपा और आज भी अपने विकृत रूप मेें मेौजूद है, लवलचत् और परस्पर विरोधी मेानसिकताओं का पुंज बनकर रह गया है । यह सब हजारों वषगों से चले आ रहे मेानसिक और मेनोवैज्ालनक अवरोिों का प्रतिफल है । यह मेानसिक ग्रंथियां ही विभिन्न स्तरों पर अपने को सही साबित करती हुई दालित को बढ़ाती ही नहीं गईं अपितु उसे अस्पृश्यता और दमेन का शिकार भी बनाती गईं । इसी का फल ्था कि दलितों को भी यह समेझाया गया कि दालित्य कर््मफल है ।
संसार मेें ऐसा कोई देश नहीं होगा जो मेानव- मेानव मेें इतना भेद रखता हो । परंतु भारत का दलित, वह शोषित मेानव है जो पैदा हुआ तब
भी दलित है, जिंदा रहेगा तब भी दलित है और मेरेगा तब भी दलित है । अ्थाणात आज भी दलित समेाज स्मेृलत युग की परंपरा मेें जी रहा है । राजनीति ने वर््तमान दौर मेें दलितों को असीलमेत अधिकार दिए हैं और दलितों को इससे काफी राहत भी लमेिी है परंतु कभी-कभी सनातनी व्यवस््था के शिकार कुछ दलित आज भी हो जाते हैं ।
वर््तमान समेय मेें दलितों के समेक्ष सबसे बड़ी चुनौती उनकी जातीय अस््ममिता एवं आल्थथिक स््थथिति को लेकर है क्योंकि जगतगुरु से लेकर छो्टे धालमेणाक मेठिाधीिों तक किसी को भी इस बात की चिंता नहीं है कि दलितों को निरंतर शोषण एवं उत्पीड़न से कैसे बचाया जा सकता है? समेाज मेें उन्हें सम्मेानजनक स््थथिति मेें कैसे लाया जा सकता है? कुछ परंपरावादी दलित चिंतक साहित्यकार, समेानता और भ्रातृत्व पर आधारित बौधि एवं अंबेडकरवादी लसधिांत की ओर आकलषणात हो रहे हैं, जो भारतीय संविधान की आत्मेा भी है । इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जैसे-जैसे अंग्ेजी शासन काल मेें अछूतों और शूद्रों के लिए शिक्षा के द्ारा खुलते गए, ये लोग शिक्षित होते गए । जहां एक ओर विज्ान की चहुमेुँखी तरक्की ने दुनिया को अपनी मेुठ्ी मेें समेे्ट लिया है, वहीं शूद्रों द्ारा हिंदू धर््म ग्ं्थों को अधिकाधिक रूप मेें पढ़ा जाने लगा है ।
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