September 2026_DA | Page 24

विशे्ष

जाति का विनाश चाहते थे डॉ. अंबेडकर

वीरेंद्र सिंह यादव

समेें कोई शक नहीं कि वणणा व्यवस््था के मेाध््यम से परंपरावालदयों ने एक प्रकार की लनणाणायक संस्कृलत और मेनोवैज्ालनक जीत हासिल कर ली है । शायद इसकी प्रलतलरिया के कारण ही दलित चेतना पूणणातः उभार पर है । डलॉ. अंबेडकर ने मेहसूस किया छुआछूत के विनाश के लिए अनिवायणा है कि जाति का विनाश हो । सा्थ ही वणणा व्यवस््था जिस पर जातियां आधारित हैं, का विनाश हो । चूंकि जाति हिंदू धर््म का प्राण है, अतः जब तक हिंदू धर््म इसके वर््तमान रूप मेें प्रचलित है तब तक जाति प्र्था रहना स्वाभाविक है । हमेारे यहां जाति सामेाजिक, राजनीतिक एवं आल्थथिक जीवन का मेूल स्ोत है अ्थाणात जाति सामेाजिक संस्कारों एवं रिश्तों की सीमेा तय करती है ।
दलित संवेदनाओं को अपने जीवनकाल मेें निरंतर भोगते रहने के कारण डलॉ. अंबेडकर का अनुभव प्रगाढ़ ्था । सामेाजिक एकता का लसधिांत उनको बौधि धर््म के अंदर ही लमेि गया । यही कारण ्था कि उन्होंने अपने कई अनुयालययों के सा्थ बौधि धर््म स्वीकार कर लिया ्था । उनका यह कदमे हमेेशा विवादास्पद ही रहा है । किंतु यदि हमे उनके धर््म परिवतणान के पीछे की वास्तलवक भावना को समझेें तो हमेें प्रतीत होता है कि इस धर््म परिवतणान के पीछे उनका यह विश्वास ्था जो उन्हें सामेाजिक एकता के आदिणा की ओर ले गया । इसका एक दूसरा पक्ष भी है । संभवतः उनको बौधि धर््म की मेहत्ा का अहसास न होता यदि वह पश््चचिम के उदारवादी दृष््टटिकोण के संपक्क मेें न आते । उन्होंने कई विदेशी समेाजों का गहन अध्ययन किया ्था और इन समेाजों
की जो विशेषता उनको विशेष रूप से प्रिय ्थी, वह ्थी सामेाजिक एकता । उनको यह अहसास हुआ कि भारतीय धर््म-दिणानों मेें बुधि-दिणान ही एक ऐसा दिणान है जो सामेाजिक एकता का आदिणा प्राप्त कर सकता है । जहां ्टैगोर ने आध्याल्त्मेक मेानवतावाद का लसधिांत प्रचारित किया, नेहरू ने समेाजवादी दृष््टटिकोण को समेझने-समेझाने का प्रयास किया, वहीं डलॉ. अंबेडकर ने जातीय संदभणा मेें पश््चचिमी उदारवादी दृष््टटिकोण की मेहत्ा को समेझाने का प्रयत्न किया । उनकी इस भूलमेका को उचित स््थान दिया
जाना चाहिए ।
हमेारे त्थाकल्थत हिंदू समेाज की सनातनी व्यवस््था मेें भारतीय दीन-दलित समेाज अज्ानांधकार मेें तड़फड़ाने के सा्थ चातुवणार्यणा व्यवस््था मेें पिसने के सा्थ दरिद्रता की आग मेें जल रहा ्था । इसके पीछे कारण यह ्था कि हमेारे लसधिांत सलदयों से ईश्वरकृत, अपौरुषेय एवं प्रश्नों से परे मेाने जाते रहे, क्योंकि इन लसधिांतों की जड़ें हमेारे जेहन मेें इतनी गहरी कर दी गई थीीं, सा्थ ही इनकी व्याख्या ऐसी की गई ्थी जिनका कोई अकाट्य प्रमेाण नहीं ्था । ऐसे
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