बाहरी रह जाती है । फुले का भारत वह भारत ्था जिसमेें मेनुष्य की गररमेा उसके जन््म से तय न हो । इसलिए आज की युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी जिम्मेेदाररयों मेें से एक है कि वह भेदभाव की मेानसिकता को अपने जीवन मेें जगह न दे ।
युवा िल्क्त का अर््थ केवल रोजगार और शिक्षा नहीं है । लोकतंत् मेें युवा की भूलमेका भी उतनी ही मेहत्वपूणणा है । युवा यदि राजनीति और सावणाजनिक जीवन से दूर रहेगा, तो उसके भविष्य से जुड़े लनणणाय दूसरे लोग लेते रहेंगे । राजनीतिक भागीदारी का अर््थ केवल चुनाव लड़ना नहीं है । अपने क्षेत् के विद्यालय की स््थथिति पर सवाल उठिाना, सरकारी अस्पताल की व्यवस््था पर आवाज उठिाना, स््थानीय प्रशासन से जवाब मेांगना, सावणाजनिक धन के उपयोग को समेझना और नीलतयों पर तथ्य आधारित बहस करना भी लोकतांलत्क भागीदारी है । फुले ने अपने समेय मेें सामेाजिक प्रश्नों को सावणाजनिक बहस का विषय बनाया । आज का युवा भी यही भूलमेका निभा सकता है ।
आज सोशल मेीडिया ने युवाओं को आवाज दी है, लेकिन आवाज और विचार मेें अंतर है । किसी विषय पर आरिोि व्यक्त कर देना आसान है; समेाधान खोजना कलठिन है । किसी व्यल्क्त को दोष देना आसान है; व्यवस््था की जल्टिताओं
को समेझना कलठिन है । फुले का जीवन हमेें कलठिन रास्ता चुनने की प्रेरणा देता है । उन्होंने केवल आलोचना नहीं की । उन्होंने विद्यालय बनाए, संगठिन बनाए और समेाज मेें वैकल््कपक चेतना पैदा की ।
आज के युवा को भी केवल शिकायत करने के बजाय छो्टे-छो्टे स्तर पर परिवतणान की शुरुआत करनी होगी । कोई युवा गरीब बच्चों को पढ़ा सकता है, कोई लडलज्टि साक्षरता अभियान चला सकता है, कोई मेलहिा शिक्षा के लिए कामे कर सकता है, कोई पयाणावरण संरक्षण की पहल कर सकता है और कोई ग्रामीण युवाओं को कौशल सिखाने का प्रयास कर सकता है । बदलाव हमेेशा संसद या सरकार से शुरू नहीं होता । कई बार वह एक छो्टे विद्यालय, एक पुस्तक, एक विचार या एक जागरूक युवा से शुरू होता है ।
मेहात्मेा फुले का सपना केवल एक शिक्षित समेाज का सपना नहीं ्था । वह ऐसे समेाज की क्कपना करते ्थे जिसमेें शिक्षा पर किसी विशेष वगणा का अधिकार न हो, मेलहिाओं को समेान अवसर लमेिे, जन््म के आधार पर भेदभाव न हो और शोषित वगगों को सम्मेान त्था अधिकार प्राप्त हों । आज भारत बदल चुका है । हमेारे पास विश्वस्तरीय तकनीक है, अंतरिक्ष कायणारिमे है, लडलज्टि भुगतान है, तेजी से बढ़ता उद्योग है और वैल्श्वक स्तर पर बढ़ती भूलमेका है । लेकिन किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी तकनीकी उपिल्ब्ियों के सा्थ-सा्थ सामेाजिक न्याय और मेानवीय गररमेा से तय होती है ।
यदि एक ओर भारत कृत्रिम बुलधिमेत्ा और अंतरिक्ष की नई सीमेाएं छू रहा हो और दूसरी ओर कोई बच्चा गुणवत्ापूणणा शिक्षा से वंचित हो, तो विकास की तस्वीर अधूरी है । यदि युवा तकनीक से दुनिया के बाजार तक पहुंच सकता है लेकिन रोजगार के लिए वषगों तक भ्टकता है, तो युवा िल्क्त का पूरा उपयोग नहीं हो रहा । यदि मेलहिाएं उच्च पदों तक पहुंच रही हैं लेकिन बड़ी संख्या मेें लड़कियां अभी भी शिक्षा की बाधाओं से जूझ रही हैं, तो फुले का सपना अभी अधूरा है ।
ज्योलतबा फुले की विरासत को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका उनके नामे पर केवल समेारोह आयोजित करना नहीं, बल््कक उनके विचारों को जीवन मेें उतारना है । आज का युवा संक्कप ले सकता है कि वह अंधविश्वास और अफवाह के बजाय तक्क और प्रमेाण को मेहत्व देगा । वह जाति और जन््म के आधार पर भेदभाव को स्वीकार नहीं करेगा । वह मेलहिाओं की समेानता को केवल नारे के रूप मेें नहीं, अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएगा । वह शिक्षा को केवल निजी सफलता का साधन नहीं, सामेाजिक जिम्मेेदारी भी मेानेगा । वह लोकतंत् मेें सलरिय नागरिक की भूलमेका निभाएगा और अपने आसपास के कमेजोर व्यल्क्त को आगे बढ़ने मेें सहायता करेगा । यही वह रास्ता है जहां फुले का सपना और युवा िल्क्त एक-दूसरे से जुड़ते हैं ।
आज भारत के युवाओं के सामेने इतिहास की किसी भी पीढ़ी से अधिक अवसर हैं । लेकिन अवसर के सा्थ जिम्मेेदारी भी है । तकनीक उन्हें आवाज दे सकती है, लेकिन उस आवाज को दिशा विचार देगा । शिक्षा उन्हें रोजगार दे सकती है, लेकिन वही शिक्षा उन्हें जिम्मेेदार नागरिक भी बनाएगी । आल्थथिक विकास उन्हें समेृधि बना सकता है, लेकिन समेानता ही उस समेृलधि को सामेाजिक न्याय मेें बदल सकती है ।
मेहात्मेा ज्योलतबा फुले ने अपने समेय मेें जिस मेिाल को जलाया ्था, वह मेिाल आज की युवा पीढ़ी के हा्थ मेें है । सवाल केवल यह नहीं है कि युवा उस मेिाल को संभालेगा या नहीं । सवाल यह है कि वह उससे क्या रोशनी पैदा करेगा ।
यदि युवा शिक्षा को अधिकार, तक्क को िल्क्त, समेानता को मेू्कय और सामेाजिक न्याय को लक्षय बना ले, तो फुले का सपना केवल इतिहास की स्मेृलत नहीं रहेगा । वह भारत के भविष्य की दिशा बन सकता है । फुले का सपना अधूरा है, लेकिन उसे पूरा करने की िल्क्त आज के युवा के पास है । जरूरत केवल इतनी है कि युवा भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय विचार का वाहक बने और बदलाव का इंतजार करने के बजाय बदलाव की शुरुआत स्वयं करे । �
flracj 2026 23