September 2026_DA | Página 22

शिक्षा

बदल रहे हैं । ऐसे मेें युवा के सामेने केवल नौकरी पाने की चुनौती नहीं है, बल््कक बदलते रोजगार बाजार के अनुसार स्वयं को लगातार प्रशिक्षित करने की चुनौती भी है । फुले ने जिस शिक्षा को मेुल्क्त का मेाध््यम मेाना ्था, आज उसे कौशल और आत्मेलनभणारता से जोड़ना होगा । युवा को केवल डिग्ी नहीं, बल््कक ऐसी क्षमेता चाहिए जिससे वह बदलती अर््थव्यवस््था मेें अपनी जगह बना सके ।
आज कृत्रिम बुलधिमेत्ा भारत के युवाओं के सामेने अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है । आने वाले वषगों मेें अनेक कायगों का स्वरूप बदल सकता है । कुछ नौकरियां कमे हो सकती हैं, नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं और अनेक क्षेत्ों मेें कामे करने के तरीके पूरी तरह बदल सकते हैं । ऐसे समेय मेें फुले का शिक्षा संबंधी विचार और मेहत्वपूणणा हो जाता है । शिक्षा यदि केवल र्टने तक सीलमेत होगी, तो मेिीनों के दौर मेें उसकी उपयोगिता कमे होगी । युवा को प्रश्न पूछना, विश्िेषण करना, समेस्या का समेाधान करना और नई पररल्स््थलतयों मेें सीखना आना चाहिए । फुले ने अपने समेय मेें स््थालपत धारणाओं को चुनौती दी ्थी । आज का युवा भी तकनीकी परिवतणान के सामेने केवल उपभोक्ता बनकर नहीं रह सकता । उसे तकनीक को समेझना और अपने
विकास के लिए उसका उपयोग करना होगा । सामेाजिक असमेानता का नया चेहरा भारत ने आल्थथिक और तकनीकी क्षेत् मेें बड़ी प्रगति की है, लेकिन सामेाजिक असमेानता का प्रश्न समेाप्त नहीं हुआ है । आज भी परिवार की आल्थथिक स््थथिति किसी बच्चे की शिक्षा और अवसरों को प्रभावित करती है । ग्रामीण और शहरी क्षेत्ों मेें सुविधाओं का अंतर है । लडलज्टि सािनों तक पहुंच मेें भी असमेानता दिखाई देती है । यहां फुले का विचार हमेें मेूल प्रश्न तक ले जाता है— क्या विकास का लाभ समेाज के हर वगणा तक पहुंच रहा है?
यदि तकनीक केवल उन युवाओं तक पहुंचे जिनके पास संसाधन हैं, तो लडलज्टि रिांलत भी असमेानता बढ़ा सकती है । यदि गुणवत्ापूणणा शिक्षा केवल मेहंगे संस््थानों तक सीलमेत रहे, तो आल्थथिक स््थथिति भविष्य तय करती रहेगी । इसलिए युवा िल्क्त को केवल संख्या के रूप मेें नहीं, सामेाजिक जिम्मेेदारी के रूप मेें देखना होगा । जिस युवा को अवसर लमेिा है, उसकी जिम्मेेदारी है कि वह अपने आसपास के वंचित बच्चों और युवाओं के लिए भी अवसर पैदा करने की कोशिश करे ।
ज्योलतबा फुले और सावित्ीबाई फुले का सबसे बड़ा सामेाजिक योगदान मेलहिा शिक्षा और सम्मेान की लड़ाई से जुड़ा है । आज भारत की
युवा मेलहिाएं हर क्षेत् मेें अपनी क्षमेता साबित कर रही हैं । वे विज्ान से लेकर खेल, प्रशासन, उद्योग, सेना, राजनीति और उद्यलमेता तक अपनी पहचान बना रही हैं । मेलहिा सशक्तीकरण का अर््थ केवल कुछ सफल मेलहिाओं की कहानियां नहीं है । वास्तलवक सशक्तीकरण तब होगा जब गांव की लड़की को भी गुणवत्ापूणणा शिक्षा लमेिे, जब परिवार बे्टी की शिक्षा को निवेश समेझे, जब उसे अपने करियर का लनणणाय लेने का अधिकार लमेिे और जब कायणास््थल पर समेान अवसर उपलब्ि हों । आज के युवा पुरुषों की भूलमेका भी मेहत्वपूणणा है । मेलहिाओं की समेानता केवल मेलहिाओं का विषय नहीं है । जिस समेाज मेें युवा पुरुष समेानता और सम्मेान की संस्कृलत अपनाते हैं, वहां परिवतणान अधिक तेजी से होता है । जाति से आगे बढ़ने की चुनौती फुले ने जन््म आधारित सामेाजिक ऊंच-नीच को चुनौती दी ्थी । आज संविधान ने समेानता का अधिकार दिया है, लेकिन सामेाजिक पूवाणाग्ह पूरी तरह समेाप्त नहीं हुए हैं । आज का युवा तकनीक के मेाध््यम से दुनिया से जुड़ा है, लेकिन यदि वह अपने आसपास के व्यल्क्त को उसकी जाति, धर््म, आल्थथिक स््थथिति या सामेाजिक पृष््ठभूलमे के आधार पर आंकता है, तो आधुनिकता केवल
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