के संपन्न परिवार का विद्यार्थी एक जैसी पररल्स््थलतयों मेें प्रतियोगिता कर रहा है? क्या केवल परीक्षा शु्कक और आवेदन पत् उपलब्ि होना ही समेान अवसर है? फुले की दृष््टटि से इसका उत्र स्पष््ट है— समेानता का अर््थ केवल दरवाजा खोल देना नहीं है; यह भी सुलनल्श्चत करना है कि उस दरवाजे तक पहुंचने के साधन सबके पास हों ।
आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं की चिंता केवल परीक्षा पास करने की नहीं है । परीक्षा की तैयारी मेें वषगों का समेय, परिवार की आल्थथिक क्षमेता, मेहंगी कोचिंग, रहने-खाने का खचणा और परीक्षा प्रणाली की अलनल्श्चतता जुड़ी होती है । जब परीक्षा प्रलरिया मेें अनियलमेतता, प्रश्नपत् से जुड़ी गड़बड़ी या परिणामे मेें देरी जैसी स््थथितियां सामेने आती हैं, तो इसका असर केवल एक परीक्षा पर नहीं पड़ता । युवा के कई वषणा प्रभावित होते हैं । यहीं फुले का शिक्षा संबंधी विचार वर््तमान संदभणा मेें मेहत्वपूणणा हो जाता है । शिक्षा व्यवस््था का उद्ेश्य केवल प्रमेाणपत् देना नहीं होना चाहिए । उसे युवा मेें
आत््मविश्वास, तक्क, कौशल और स्वतंत् चिंतन
विकसित करना चाहिए । लडलज्टि युग का युवा और फुले का‘ सत्य’ आज ज्योलतबा फुले जीवित होते तो संभवतः उनके सामेने सामेाजिक संघषणा का मेाध््यम विद्यालय के सा्थ-सा्थ लडलज्टि दुनिया भी होती । आज सूचना की गति अभूतपूवणा है । एक मेोबाइल फोन से युवा दुनिया भर का ज्ान हासिल कर सकता है । लेकिन यही मेाध््यम झूठि, अफवाह और पूवाणाग्ह को भी तेजी से फैलाता है । सोशल मेीडिया पर किसी घ्टना का अधूरा वीडियो कुछ ही समेय मेें लाखों लोगों तक पहुंच जाता है । बिना तथ्य जांचे संदेश आगे बढ़ाना सामेान्य व्यवहार बन गया है ।
आज का युवा आधुनिक सत्यिोधक तभी कहलाएगा जब वह किसी दावे को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उसे हजारों लोग साझा कर रहे हैं । वह स्ोत पूछेगा, तथ्य देखेगा, प्रमेाण खोजेगा और तक्क के आधार पर निष्कषणा निकालेगा । यह केवल व्यल्क्तगत आदत नहीं है । यह लोकतंत् की आवश्यकता है । जिस समेाज मेें नागरिक
बिना जांचे हर सूचना को सच मेान लेते हैं, वहां अफवाहें सामेाजिक तनाव पैदा कर सकती हैं । इसलिए लडलज्टि साक्षरता आज की युवा शिक्षा का अनिवायणा हिस्सा होनी चाहिए । कृत्रिम बुलधिमेत्ा का दौर और युवा भारत की युवा िल्क्त की चचाणा रोजगार के सवाल के बिना अधूरी है । देश के युवा केवल भाषणों मेें अपने भविष्य की तलाश नहीं करते । उन्हें वास्तलवक अवसर चाहिए । उन्हें ऐसी शिक्षा चाहिए जो रोजगार और उद्यलमेता से जुड़ सके । उन्हें ऐसी अर््थव्यवस््था चाहिए जिसमेें उनकी योग्यता का उपयोग हो । आज लाखों युवा सरकारी नौकररयों की तैयारी करते हैं क्योंकि सरकारी रोजगार उन्हें स््थथिरता और सामेाजिक सुरक्षा देता है । लेकिन सीलमेत पदों के मेुकाबले आवेदकों की संख्या बहुत अधिक होती है । इसका परिणामे यह है कि एक पद के लिए बड़ी संख्या मेें युवा वषगों तक तैयारी करते रहते हैं ।
दूसरी ओर निजी क्षेत् मेें भी रोजगार की प्रकृति बदल रही है । कृत्रिम बुलधिमेत्ा, स्वचालन और लडलज्टि तकनीक कई पारंपरिक नौकररयों को
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