September 2026_DA | Page 26

विशे्ष

स्वतंत् भारत मेें संवैधानिक संरक्षण और प्रदत् सुविधाओं, अपने अधिकारों को समेझने और उन्हें पाने के कारण से परंपरावालदयों के अनेक बंधन शिल्थि होते गए । वर््तमान मेें भी जो सनातनी( वैदिक) साहित्य उपलब्ि है, उसमेें अभिजात्य एवं सवणणावादी प्रवृलत्यों के लक्षण सवाणालिक व्याप्त हैं । उसमेें शासक और शोषित दोनों ही भावनाएँ सवणात् नजर आती हैं ।
अंबेडकरवाद की लद्तीय मेुक्त शृंखला का आरंभ 1975 के बाद प्रारंभ होता है । 1975 के बाद दलित चेतना की जो धारा विकसित हुई, वह इसलिए विशिष््ट है कि उसने हिंदी जगत मेें अपनी पृ्थक और विशिष््ट पहचान बनाई । यह प्रयास अभिनव एवं मेहत्वपूणणा है, क्योंकि अभी तक ऐसा प्रयास किसी युग मेें नहीं किया गया ्था । एक पृ्थक धारा के रूप मेें हिंदी दलित विषयक साहित्य इसी युग मेें अल्स्तत्व मेें आया । यही नहीं बल््कक उसे परिभाषित भी इसी काल मेें किया गया । यह धारा समग्र रूप मेें अंबेडकर- दिणान से विकसित हुई और यह दिणान ही उसका मेूलाधार बना । इसमेें कोई दो राय नहीं कि अंबेडकर-दिणान मेें दलित-मेुल्क्त की अवधारणा की अभिव्यंजना ही वर््तमान हिंदी दलित विषयक साहित्य की प्रतिबधिता है । इसने नए सौंदयणािास्त् की स््थापना की जो स्वतंत्ता, समेता और बंधुत्व के लसधिांतों पर आधारित है । इस धारा ने अपने सौंदयणािास्त् से हिंदी मेुख्यिारा के साहित्य का मेू्कयांकन कर उसे काफी हद तक दलितों के
लिए अप्रासंगिक साबित किया है । इसने प्रेमेचंद्र, निराला एवं अन्य रचनाकारों तक का पुनमेू णा्कयांकन किया और उनकी कई रचनात््मक स््थापनाओं पर प्रश्नचिह्न भी लगाए । वर््तमान हिंदी दलित विषयक साहित्य इस अर््थ मेें भी विशिष््ट है कि साहित्य की सभी विधाओं मेें उसका विकास हो रहा है ।
यद्यपि फुले और अंबेडकर ने संस््थागत प्रयत्नों के मेाध््यम से दलितों के पक्ष-पोषण की बात की लेकिन 1970 के दशक के बाद कई संस््थाएं सामेने आती हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों से दलितों के उत््थान पर कायणा किया । इस संदभणा मेें दलित विषयक साहित्य प्रकाशन संस््था, अंबेडकर लमेिन, दलित आगणानाइजेशन, राष्ट्रीय दलित संघ, दलित राइटर््स फोरमे, दलित साहित्य मेंच, लोक क्कयाण संस््थान आदि के मेाध््यम से दलितों की स््थथिति सुधारने के संदभणा मेें अनेक कायणा किए गए । इन दलित संस््थाओं ने जिन दो मेहत्वपूणणा पक्षों की ओर ध्यान आकृष््ट कराया उनमेें एक है दलितों की सामेाजिक स््थथिति मेें सुधार और दूसरा दलितों के लिए आरक्षण की मेांग । इस संदभणा मेें भारतीय संविधान मेें संशोधन का भी प्रावधान किया गया और संस््थाओं मेें समेाचार पत्ों, लेखों और गोष््ठठियों का भी सहारा लिया जिसके मेाध््यम से दलितों को जागरूक और एकलत्त करने का कायणा किया गया । यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इन संस््थाओं ने दलित चिंतन
को राजनीतिक स्वरूप भी प्रदान किया और समेाज मेें एक विशेष वगणा का नए सिरे से ध्ुवीकरण किया ।
इसमेें कोई संदेह नहीं है कि वर््तमान सामेाजिक एवं राजनीतिक परिप्रेक्षय मेें दलित विमर््श चिंतन का एक प्रमेुख हिस्सा बन चुका है । मेौजूदा दलित विषयक साहित्यकारों ने दलित विषयक लेखन को स््थपित करने के लिए कड़ा संघषणा किया । यह उनके संघषगों का ही परिणामे है कि हिंदी जगत और मेीडिया ने एक शताब्दी की लंबी उपेक्षा के बाद दलित साहित्य को स्वीकार किया और उसे अपने पत्ों एवं पलत्काओं मेें ्थोड़ा-्थोड़ा स््थान दिया । लेकिन यह भी तब संभव हुआ, जब सामेाजिक परिवतणान की राजनीति ने नई दलित चेतना विकसित की और उसका प्रभाव संपूणणा संविधान पर पड़ा । इसलिए यह हिंदी जगत की राजनैतिक विवशता भी है । इस मेत से कुछ लवद्त दलित चिंतकों की असहमेलत हो सकती है, परंतु सत्ा के बनते-बिगड़ते समेीकरण भी दलित विषयक साहित्य को प्रभावित करते हैं, इस बात से मेुंह नहीं मेोड़ा जा सकता है । कुछ हद तक यह युग दलित विषयक पत्कारिता के लिए भी जाना जाएगा, क्योंकि दलित विषयक साहित्य के सा्थ-सा्थ दलित विषयक पत्कारिता का भी सशक्त विकास इस युग मेें हुआ है । इसलिए दलित चेतना के इस वर््तमान युग को दलित ' नवजागरण ' युग का नामे भी दिया जा सकता है । �
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