September 2026_DA | Seite 19

मेानव समेानता की बात कही है । उन्होंने मेनुष्य को उसके कर््म, आचरण और मेानवीय गुणों से पहचानने की प्रेरणा दी । उनकी वाणी ने उन सामेाजिक दीवारों को चुनौती दी, जो मेनुष्य को मेनुष्य से अलग करती थीीं ।
650वीं जयंती का वषणा इसलिए भी मेहत्वपूणणा है कि यह नई पीढ़ी को संत रविदास जी के विचारों से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है । आज के युवा लडलज्टि मेाध्यमेों और आधुनिक शिक्षा से तेजी से जुड़ रहे हैं । ऐसे मेें संत रविदास जी की शिक्षाओं को केवल पारंपरिक आयोजनों तक सीलमेत रखने के बजाय उन्हें शिक्षा, सामेाजिक संवाद और जनजागरूकता से जोड़ना भी आवश्यक है ।
समेरसता का अर््थ केवल यह कहना नहीं कि सभी बराबर हैं । इसका वास्तलवक अर््थ है कि व्यवहार मेें भी किसी के सा्थ भेदभाव न हो, अवसरों मेें असमेानता कमे हो और प्रत्येक व्यल्क्त की गररमेा का सम्मेान किया जाए । संत रविदास जी के विचार इसी व्यापक सामेाजिक परिवतणान की प्रेरणा देते हैं ।
पावन मेा्टी कलश वितरण अभियान इसी संदेश को प्रतीकात््मक रूप से घर-घर पहुंचाने की पहल है । वाराणसी की भूलमे से लद्किी तक पहुंची यह मेा्टी दो शहरों के बीच सांस्कृलतक और आध्याल्त्मेक संबंध का प्रतीक बनने के सा्थ-सा्थ संत रविदास जी की स्मेृलत और विचारों को भी जोड़ती है ।
कायणारिमे मेें व्यक्त संदेश का व्यापक अर््थ यही है कि सामेाजिक समेरसता किसी एक सरकार, संस््था या संगठिन की जिम्मेेदारी नहीं हो सकती । यह पूरे समेाज की साझा जिम्मेेदारी है । परिवार से लेकर विद्यालय, सामेाजिक संस््थाओं से लेकर प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व से लेकर आमे नागरिक तक सभी को समेानता और सम्मेान की संस्कृलत को मेजबूत करना होगा ।
मेुख््यमंत्ी रेखा गुप्ता ने कहा कि संत रविदास जी की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाना इस अभियान का प्रमेुख उद्ेश्य है । ऐसे मेें इस पहल की सफलता का आकलन केवल यह देखकर
नहीं किया जाएगा कि कितने कलश वितरित हुए, बल््कक यह देखकर होगा कि कितने लोगों तक संत रविदास जी के विचार पहुंचे और कितने लोगों ने उन्हें अपने जीवन मेें अपनाने का प्रयास किया ।
लद्किी मेें पावन मेा्टी का पहुंचना एक प्रतीक है, लेकिन उससे जुड़ा संक्कप उससे कहीं बड़ा है । यह संक्कप समेानता का है, सम्मेान का है और भाईचारे का है । संत रविदास जी की 650वीं जयंती का अवसर यदि समेाज को इन तीन मेू्कयों के प्रति और अधिक जागरूक बनाता है, तो यह आयोजन अपने उद्ेश्य मेें सफल मेाना जाएगा ।
विकसित भारत की क्कपना केवल मेजबूत अर््थव्यवस््था, आधुनिक अवसंरचना और तकनीकी प्रगति से पूरी नहीं होगी । इसके लिए
ऐसा समेाज भी आवश्यक है जिसमेें व्यल्क्त की गररमेा सुरक्षित हो, अवसरों तक पहुंच समेान हो और सामेाजिक विभाजन की दीवारें कमेजोर हों । संत रविदास जी की शिक्षाएं इसी मेानवीय और समेतामेूलक समेाज की दिशा मेें प्रेरणा देती हैं ।
तालक्टोरा स््टेलडयमे से शुरू हुआ यह समेरसता संक्कप अब लद्किी के अलग-अलग लजिों और बल्स्तयों तक पहुंचने की तैयारी मेें है । वाराणसी की पलवत् मेा्टी के मेाध््यम से लद्किी के घरों तक पहुंचने वाला यह संदेश आने वाले समेय मेें तभी प्रभावशाली साबित होगा, जब मेा्टी के सा्थ संत रविदास जी की विचारधारा भी लोगों के मेन और व्यवहार तक पहुंचे । यही 650वीं जयंती के अवसर पर समेरसता संक्कप की वास्तलवक कसौ्टी और सबसे बड़ा उद्ेश्य है । �
flracj 2026 19