October 2026_DA | Page 47

सकता है कि स्त्री और दलित स्त्री उनके व््यक्क्तत्ि व उनके दशवान का अवम्ट हिस्सा है और ्यह स्त्री चेतना उनके परिवार, उनके आसपास, व विदेश में किए उनके अध््य्यन व तरह-तरह के आन्ददोलनों में जुड़ने से आई । निसन्ददेह उनके स्त्री दशवान के विकसित होने का मूलाधार परिवार करी महिलाओं करी उनके उपर पड़ने वालरी अवम्ट छाप भरी है ।
्डोॉ. आंबे्डोकर जब विदेश में पढ़ने गए तो वहां के स्ितन्दत् जरीिन में उन्दहोनें स्त्रियोों को चहुंमुखरी विकास करते देखा तब उन्दहे समझ में आ्या कि बिना स्त्री शिक्ा के कोई भरी प्रगति अधूररी है । विदेश में होते हुए वहां करी स्त्रियोों को स्ितन्दत्तापूिवाक जरीिन जरीते हुए, चिंतन-मनन
करते हुए, उनकरी प्रगति देख उनकरी स्त्री चेतना
को धार मिलरी । 1913 में न्द्ययूयाक्क में पढ़ते हुए, ्डोॉ. आंबे्डोकर ने अपने पिता के वमत् को जवाब देते हुए पत् में लिखा‘ ्यह गलत है कि मां-बाप बच्ों को जन््म देते है कमवा नहरी देते । मां-बाप बच्ों के जरीिन को उचित मोड़ दे सकते है, ्यह बात अपने मन पर अंकित कर ्यवद हम लोग अपने लड़कों करी शिक्ा के साथ हरी लड़कियोों करी शिक्ा के लिए भरी प्र्यास करें तो हमारे समाज करी उन्वत तरीव्र होगरी । इसलिए आपको नजदरीक रिश्तेदारों में ्यह विचार तेजरी से फैलाना चाहिए ।’( धनंज्य करीर करी पुस्तक ्डोॉ. अम््बबेडकर-लाईफ एण््डो मिशन से उद्धृत)
्डोॉ. आंबे्डोकर एकमात् ऐसे विश्िस्तररी्य चिंतक है वजन्दहोने परिवार और समाज में स्त्री करी क्स्थवत कैसरी हो, इस पर गहन चिंतन-मनन वक्या । पुरूिों के साथ स्त्री को भरी समानता व स्ितन्दत्ता मिले, उसे समाजिक आजादरी के साथ आवथवाक आजादरी भरी प्राप्त हो, परिवार में उसका दजावा पुरूष के समान हो, इसके लिए उन्दहोंने दलित गैर दलित स्त्रियोों को समाज पररितवान के आन्ददोलन में सवरि्य रूप से जुड़ने का आह्ान वक्या । दोनों जगत ्यानि घर और समाज में नाररी करी हरीनतर क्स्थवत को देखकर उन्दहोंने इस विि्य पर खूब सोचा कि भारतरी्य स्त्री करी क्स्थवत में रिांवतकाररी पररितवान कैसे आए । ्यह रिांवतकाररी पररितवान परिवार तथा समाज में नाररी को विशेषाधिकार देकर हरी वक्या जा सकता था । ्डोॉ. आंबे्डोकर का मानना था कि स्त्री तथा समाज करी उन्वत, शिक्ा के बिना नहरी हो सकतरी । सुन््दर और सुवशवक्त व सभ््य परिवार के लिए आवश््यक है कि पुरूिों के साथ-साथ घर करी क्स्त््यां भरी पढ़री लिखरी हो ताकि वे समाज पररितवान करी प्रवरि्या में शामिल हो सके । समाज के पररितवान द्ारा हरी स्त्रियोों करी मुक्क्त सम्भि है । ्डोॉ. आंबे्डोकर का मानना था कि परिवार में स्त्री शिक्ा हरी वास्तविक प्रगति करी धुररी है । जिस घर में पढ़री लिखरी स्त्री व मां हो उस घर के बच्ों का भविष््य अपने आप उज्जवल हो जाता है । स्त्री शिक्ा को ्डोॉ. आंबे्डोकर महत्ि देते हुए कहते है कि अगर घर में एक पुरूष पढ़ता है तो केवल वहरी पढ़ता है और ्यवद घर में स्त्री
पढ़तरी है तो पूरा परिवार पढ़ता है ।
्डोॉ. आंबे्डोकर ने भारतरी्य साहित््य में प्राचरीन से लेकर आधुनिक साहित््य के साथ-साथ विदेशरी साहित््य का भरी अच्छरी प्रकार से अध््य्यन मनन वक्या था । साहित््य अध््य्य्यन के दौरान वशवक्त व स्ितन्दत् स्त्रियोों उदाहरर् के रूप में उनके सामने बुद्ध करी थेरियोों से लेकर सावित्री बाई फूले व उनकरी कई महिला वमत् थीं, वजन्दहोंने पढ़-लिख कर समाज पररितवान के लिए काम वक्या । इसलिए वह दलित स्त्री को वशवक्त करने के लिए प्रतिबद्ध थे । परिवार में औरत करी क्स्थवत सुदृढ़ करने के लिए ्डोॉ. आंबे्डोकर ने शिक्ा के महत्ि के साथ-साथ सामाजिक कुररीवत्यों जैसे बाल विवाह, बहु-पत्निवाद, देवदासरी प्रथा आदि के खिलाफ भरी अपनरी जनसभाओं में बात रखरी । परिवार में लड़करी-लड़के का पालन-पोिर् समान रूप से होना चाहिए । उन्दहोनें दलित परिवारों से अनुरोध वक्या कि वे अपने बच्ों करी खासकर लड़कियोों करी शादरी बचपन में ना करें ।‘ पालक अपनरी संतान करी शादरी कम उम्र में करके उनके जरीिन को नरक ना बनाएं ।’ ्डोॉ. आंबे्डोकर महिलाओं को उसकरी समाज द्ारा दरी गई भूमिकाएं मां, पत्नरी, बहन एवं उसके स्त्रियोोंचित गुणोों से इतर उसको पूर््ण स्ितन्दत्, स्िस्थ एवं प्रगतिशरील कमवाठ मानिरी के रूप में देखते थे । उनके जरीिन दशवान में निहित स्िस्थ प्रफुक्ल्लत वशवक्त, समाजिक सरोकारों में भागरीदार दलित और गैर दलित स्त्री अत््यन््त महत्िपूर््ण स्थान पर स्थावपत थरी । ्डोॉ. आंबे्डोकर का काल दलित महिलाओं करी अपनरी व समाज करी स्ितन्दत्ता समानता को लेकर करी गई सवरि्य व संघिवापूर््ण भागरीदाररी का स्िर््ण काल है । ्डोॉ. आंबे्डोकर के सम्य में चले दलित आन्ददोलन में लाखों-लाख वशवक्त-अवशवक्त, घरेलू, गररीब मजदूर किसान दलित शोषित महिलायेें जुड़री । उन्दहोनें जिस वनभशीकता बेबाकरी और उत्साह से दलित आन्ददोलन में भागरीदाररी निभाई वह अभूतपूिवा थरी ।
दलित महिला आन्ददोलन और ्डोॉ. आंबे्डोकर के साथ महिला आन्ददोलन करी सुसंगत शुरूआत 1920 से मान सकते है हालांकि सुगबुगाह्ट सन्
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