विश्िेषर्
1913 से हरी हो गई थरी । 1920 में भारतरी्य बहिष्कृत परिषद करी सभा कोल्हापुर नरेश छत्पति शाहू जरी महाराज करी अध््यक्ता में सम्पन् हुई । इस सभा में पहलरी बार दलित महिलाओं ने भाग लेकर अपनरी सवरि्य भूमिका निभाई । पहलरी बार दलित स्त्रियोों ने शिक्ा के महत्ि को समझते हुए इस सभा में सौ. तुलसाबाई बनसो्डोे और रूकमवर् बाई ने घरेलू भाषा में लड़कियोों करी शिक्ा पर बात रखरी उन्दहोने अपने विचार रखते हुए कहा कि लड़कियोों करी असलरी शक्क्त शिक्ा हरी है । इस परिषद में लड़कियोों के लिए अनिवार््य और मुफत शिक्ा का प्रस्ताि पारित वक्या ग्या ।
देश भर चल रहे दलित आन्ददोलन के साथ दलित महिला आन्ददोलन भरी अपना आकार ले रहा था । 1920 से आरम्भ हुए दलित महिला आन्ददोलन में दलित महिलाओं करी सवरि्य भागरीदाररी बढ़तरी जा रहरी थरी । 20 जुलाई 1924 में मुबंई में आ्योजित बहिष्कृत हितकाररर्री सभा करी स्थापना करी गई । इस सभा करी स्थापना का मुख््य उद्ेश््य अस्पृश््यता के खिलाफ जंग छेड़ने के अलावा दलित बक्स्त्यों में स्कूल व छात्ािास खोलने सम्बन्दधरी प्र्यास कर दलित समाज में जागृति व चेतना पैदा करना था । बहिष्कृत हितकाररर्री सभा करी अधिसंख््य सभाएं जो जगह-जगह गांव, देहातों में आ्योजित करी जातरी थरी, उनमें दलित महिलाएं लगातार उपक्स्थत रहतरी थीं । इस सम्य दलित महिलाएं अपने समाज और परिवार जनित परीड़ा को सािवाजनिक रूप से अभिव््यक्त कर रहरी थीं । पर उनकरी अभिव््यक्क्त अधिकतर गानों व स्िागत गान के रूप में हरी होतरी थरी । बहिष्कृत हितकाररर्री सभा करी मिटिगोों में वेर्ुबाई भ्टकर और रंगबाई शुभरकर अपने मधुर कंठ से दलित परीड़ा करी मावमवाक और संघिवापूर््ण अभिव््यक्क्त को गीतोों में ढालकर मनमोहक स्िर में गाकर सबका मन मोह लेतरी थीं ।
1924 में हरी एक अत््यन््त रिाक्न्दतकाररी घ्टना घ्टरी जिसने दलित महिला आन्ददोलन करी सवरि्यता एवं उसके विचारात्मक पक् को उभारने का भरपूर मौका वद्या । वह रिांवतकाररी घ्टना थरी एक दलित महिला द्ारा दलित बवच््यों के
लिए विद्याल्य स्थावपत करना । उच् वशवक्त दलित महिला जाईबाई चौधररी जो बाद में सशक्त दलित महिला नेता के स्थावपत हुई । उन्दहोने 1924 में चोखा मेला कन्द्या पाठशाला आरम्भ करी । जाईबाई चौधररी स्िं्य बहुत हरी मुसरीबतों से पढ़-लिख पाई थीं । जाईबाई चौधररी घर व समाज का तरीव्र विरोध सहकर वशवक्का बनरी थरी । जाई बाई चौधररी वशवक्का के साथ-साथ एक जागरूक लेखिका एंव अच्छरी वक्ता भरी थरी । जाईबाई चौधररी बाबा साहब के वशवक्ओं से प्रभावित उनकरी पक्करी अनु्या्यरी थरी । जाईबाई चौधररी ने स्त्री शिक्ा को अत््यधिक महत्िपूर््ण मानते हुए सिवाप्रथम नाररी को वशवक्त करने पर बल वद्या । जाईबाई चौधररी के अथक प्र्यासों से दलित महिला आन्ददोलन करी माला में संघिवा का एक मोतरी और जुड़ ग्या ।
मोहपा में‘ मध््याप्रान्दत, वरा्डो महार परिषद’ 23-24 फरवररी, 1924 में हरी आ्योजित करी गई ।‘ इस सभा में एक ब्राह्मर् वक्ता ने कहा कि महारों को क्टा हुआ मांस नहरी खाना चाहिए परन्दतु उनका मृत मांस खाने में कोई हजवा नहरी है ।‘ ब्राह्मर् वक्ता करी इस बात पर वेर्ुबाई भ्टकर ओर रंगुबाई शुभरकर ने खूब धुनाई करी ।‘( आम्हरी इतिहास घड़वला- उवमवाला पवार, मिनाक्षी मून) महिलाओं करी इस सभा में दवलतों ने ्यह प्रर् वल्या कि अब अस्पृश््य लोग वहन्ददुओं पर वनभवार नहरी रहेंगें और अपनरी मुक्क्त के रास्ते खुद खोजेगें । इस सभा के आखिर में दो प्रस्ताि पारित किए गए पहला ्यह कि अस्पृश््यता के खिलाफ सरकाररी कार््यवाहरी होनरी चाहिए । दूसरा सरकार का ध््यान शिक्ा करी और खींचना चाहिए ।
1920 लेकर 1924 तक दलित महिला आन्ददोलन अपनरी मंथर गति से चलता हुआ स्त्री शिक्ा और अस्पृश््यता के मुद्े पर समाज का ध््यान खींचता रहा । 1927 का साल दलित आन्ददोलन के साथ-साथ दलित महिला आन्ददोलन के लिए भरी अत््यन््त महत्िपूर््ण है । 1927 के अन््त में बाबा साहब द्ारा चला्ये गए महाड़ सत््याग्रह करी पररर्वत‘ मनुस्मृवत दहन’ और‘ चावदार तालाब का पानरी परीने’ से हुई । पहलरी घ्टना पानरी, जिसके लिए दलित क्स्त््यां
रोज-रोज बेइज्जतरी सहतरी थरी, दूसरे मनुस्मृवत जिसके कारर् स्त्री का जरीिन नरक हो ग्या था, पानरी का दलित महिलाओं द्ारा उप्योग होना, व मनु के विधान को जला्या जाना, इन दोनों घ्टनाओं ने दलित महिलाओं के मानसिक, वैचारिक, बौद्धिक और सामाजिक रूप में उसके जरीिन करी का्यापल्ट हरी कर दरी । मनुस्मृवत दहन के कारर् एक तो बाबा साहब स्त्रियोों सबसे बड़े हितैिरी कहलाए दूसरे वे हितैिरी होने साथ दलित महिला आन्ददोलन के वैचारिक महाना्यक करी पदिरी पर हमेशा-हमेशा के लिए आसरीन हो गए । दलित स्त्री अब मंचों पर खुलकर बोलने लगरी । वह स्ितन्दत्ता से सोचने लगरी । सभाओं में दलित महिलाओं करी बढ़तरी भागरीदाररी से ्डोॉ. आंबे्डोकर द्ारा चलाएं जा रहे दलित आन्ददोलन को ताकत मिलरी और उसमें तेजरी आ गई । दलित महिलाएं और उनकरी नेत्रियां गलरी-गलरी गांव-गांव घूमते हुए सभाएं लेने लगरी और दलित महिलाओं को सामाजिक, राजनरीवतक व आवथवाक रूप से संगठित करने लगरी ।
25 दिसम्बर, 1927 को चावदार तलाब के महाड़ सत््याग्रह के ऐतिहासिक सम्मेलन में ढाई हजार दलित औरतों ने‘ मनुस्मृवत दहन’ में शामिल होकर वहन्ददू धमवा के स्त्री विरोधरी कानून
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