October 2026_DA | Page 26

विशेष

्शूद्ररों का ित्णमान दलितोों स़े कोई ल़ेना द़ेना नहीं है: डॉ. अंब़ेडकर

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लसरीदास द्ारा रचित रामचरित मानस को अधिकांशतः भावाथवा में समझने का प्र्यास वक्या जाता है । भावाथवा में सुधिजन अपने अपने दृष््टटिकोर्, मानसिक अभ््यास और अनुभव के आधार पर चिंतन करते हैं । ्यहां हम भावाथवा को त््यागकर शाक्ब्दक अथवा का उल्लेख करना चाहता हूँ ।
' अधिकाररी ' शब्द का क््या अथवा होता है..?'' ऐसा व््यक्क्त ्या ऐसा िगवा अथवा ऐसरी संस्था जिसे समाज ने ्या सरकार ने कुछ अधिकार ्या शक्क्त
वद्या हो । जैसे एक न्द्ययायाधरीश को फाँसरी देने का अधिकार होता है तो वह खुद अपने को फाँसरी नहीं देता । सामने वाले अपराधरी को फाँसरी देता है । जिलाधिकाररी को जो अधिकार होता है, वह जिले के सभरी नागररकों पर लागू करता है ।
ऐसे में ्यह देखा जा्ये कि तुलसरीदास द्ारा िवर्वात इन पांच िगषों को किसने अधिकार वद्या है..? आजकल करी तरह लिखित संवैधानिक सरकार तो था नहीं, इसलिए स्िाभाविक है कि सरकार ने नहीं अपितु समाज ने हरी अधिकार वद्या होगा । सामाजिक वन्यम सारभौमिक होते
हुए स्थान-कालादि से परे सभरी के लिए होता है । अब चौपाई पर दृष््टटि ्डोाला जा्ये । ढ़ोल, गवार, शूद्र, पशु और नाररी को क््या अधिकार समाज ने वद्या है..? तो इस प्रश्न का उत्तर है कि हां.. ्यह अधिकार समाज द्ारा हरी उक्त पांचों िगषों को वद्या ग्या है ।
इसरी प्रकार ्यहां इनके अधिकार करी बात कहरी गई हैं । नाररी को ्यह अधिकार है कि ्यवद उसके साथ मिसबहैव ्यानरी छेड़छाड़ हो तो वह उस व््यक्क्त को दस चप्पल मार सकतरी है..। वह दं्डो दे सकतरी है..। ्यह अधिकार उसे समाज ने वद्या
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