और परस्पर सह्योग करी महत्िपूर््ण भूमिका रहरी है । इसलिए गांधरी के ग्राम स्िराज को आज के संदभवा में पढ़ते सम्य आदिवासरी समाज का अनुभव एक महत्िपूर््ण संदभवा बन सकता है ।
लेकिन ्यह समानता स्थावपत करते सम्य ्यह समझना भरी जरूररी है कि भारत का आदिवासरी समाज कोई एकरूप समूह नहीं है । देश में सैकड़ों आदिवासरी समुदा्य हैं, जिनकरी भाषाएं, परंपराएं, सामाजिक संरचनाएं और आवथवाक परिस््थथितियां अलग-अलग हैं । उन्दहें केवल‘ प्रकृति के कररीब रहने वाला समाज’ कहकर छोड़ देना भरी उनकरी वास्तविकता को सरीवमत करना होगा । वे आधुनिक शिक्ा, स्िास्थ््य, तकनरीक, रोजगार और आवथवाक अवसरों के उतने हरी अधिकाररी हैं जितना देश का कोई अन्द्य नागरिक ।
्यहरी ितवामान भारत करी सबसे बड़री चुनौतरी भरी है— आदिवासरी क्ेत्ों को विकास से जोड़ना, लेकिन विकास करी प्रवरि्या में उनकरी पहचान और भागरीदाररी को कमजोर किए बिना । आज सड़क, बिजलरी, इं्टरने्ट, दूरसंचार, बैंकिंग और व्डोवज्टल सेवाएं दूरस्थ इलाकों तक पहुंच रहरी हैं । सरकाररी ्योजनाओं के विस्तार ने अनेक क्ेत्ों
में जरीिन करी बुवन्यादरी सुविधाओं को बदला है । लेकिन विकास का अगला चरर् केवल सुविधाओं करी उपलब्धता नहीं, बक्ल्क स्थानरी्य समुदायोों को विकास का सवरि्य भागरीदार बनाने का होना चाहिए ।
गांधरी का प्रकृति संबंधरी दृष््टटिकोर् इस बहस को एक नैतिक आधार देता है । उनका जरीिन सं्यम, आवश््यकता और जिम्मेदाररी पर केंद्रित था । आज जब जलवा्यु पररितवान, जंगलों के क्रर्, जल संक्ट और जैव विविधता के नुकसान करी चुनौवत्यां दुवन्या के सामने हैं, तब संसाधनों के विवेकपूर््ण उप्योग का प्रश्न पहले से अधिक गंभरीर हो ग्या है । आदिवासरी समाज का पारंपरिक ज्ान इस संदभवा में महत्िपूर््ण हो सकता है, क््योंकि अनेक समुदायोों ने जंगल, जल और भूमि को केवल आवथवाक संपत्ति नहीं बक्ल्क जरीिन- व््यवस्था के रूप में देखा है ।
इसका अथवा ्यह नहीं कि पारंपरिक व््यवस्था को आधुनिक विकास का विकल्प मान वल्या जाए । विज्ान और तकनरीक ने स्िास्थ््य, शिक्ा, संचार और उत्पादकता के क्ेत् में अभूतपूिवा संभावनाएं पैदा करी हैं । असलरी चुनौतरी ्यह है कि
आधुनिक तकनरीक और स्थानरी्य ज्ान को किस प्रकार जोड़ा जाए । उदाहरर् के लिए, दूरस्थ आदिवासरी क्ेत्ों में ्टेलरीमेव्डोवसन, मोबाइल स्िास्थ््य सेवाएं और व्डोवज्टल स्िास्थ््य प्रर्ावल्यां आधुनिक चिकित्सा को स्थानरी्य स्तर तक पहुंचा सकतरी हैं । इसरी प्रकार व्डोवज्टल शिक्ा स्थानरी्य भाषाओं और सांस्कृवतक संदभषों के साथ जुड़कर नई पीढ़़ी के लिए अवसरों का विस्तार कर सकतरी है ।
गांधरी का स्िदेशरी विचार भरी ्यहां नए अथवा ग्रहर् करता है । स्िदेशरी केवल विदेशरी वस्तुओं का विरोध नहीं था । गांधरी इसे स्थानरी्य उत्पादन, स्थानरी्य श्रम और स्थानरी्य आवश््यकताओं से जोड़ते थे । आज आदिवासरी क्ेत्ों में लघु वनोपज, बांस, शहद, लाख, हस्तवशल्प, औषधरी्य पौधों और पारंपरिक खाद्य उत्पादों को आधुनिक प्रसंस्करर्, पैकेजिंग, ब््रांडिंग और व्डोवज्टल बाजार से जोड़ा जा सकता है । इससे स्थानरी्य संसाधनों का अधिक मूल््य समुदा्य के भरीतर रह सकता है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं ।
्यहां गांधरी का स्िािलंबन और आज करी
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