October 2026_DA | Seite 16

गांधी दश्शन और आदिवासी जीवन-मूल्यों का संगम प्रकृति के सार् सह-अब्स्तत्ि, सामुदायिक सहयोग और श्रम के सम्मान पर टिका है । गांधी का स्िराज और आदिवासी परंपरा दोनों ही सत्ा व पूंजी के बजाय अंतिम व्यब्क्त, स्र्ानीय निर््णय और आत्मवनभ्शरता को विकास का केंद्र मानते हैं । आधुनिक तकनीक और इस पारंपरिक चेतना का तालमेल ही टिकाऊ और समावेशी भारत का आधार बन सकता है ।

प्रकृति से स्िराज तक

गांधी दर््शन और आदिवासी जीवन-मूल्ययों

भा

रत करी आत्मा को केवल उसके महानगरों, औद्योगिक गवल्यारों और तेजरी से बदलतरी अथवाव््यवस्था में तलाशना अधूरा प्र्यास होगा । इस देश करी एक गहररी और पुरानरी चेतना उन जंगलों, पहाड़ों, नदियोों और गांिों में भरी जरीवित है, जहां आदिवासरी समाज ने प्रकृति के साथ सह-अक्स्तत्ि, सामुदाव्यक सह्योग और श्रम करी प्रतिष्ठा पर आधारित जरीिन-पद्धति को परीवढ़्यों से आगे बढ़ा्या है । ्यहरी वह बिंदु है जहां महात्मा गांधरी के दशवान और आदिवासरी जरीिन- मूल््यों के बरीच एक साथवाक संवाद दिखाई देता है ।
गांधरी का स्िराज केवल सत्ता पररितवान का विचार नहीं था । उनके लिए स्िराज का अथवा था— व््यक्क्त, गांव और समुदा्य अपने जरीिन से जुड़े निर््णयोों में सक्म और सहभागरी हों । वे ऐसरी व््यवस्था के पक्धर थे जिसमें विकास का केंद्र सत्ता ्या पूंजरी नहीं, बक्ल्क सामान्द्य मनुष््य हो । आदिवासरी समाज करी पारंपरिक सामुदाव्यक व््यवस्थाओं में भरी स्थानरी्य निर्वा्य, साझा संसाधन

की साझी विरासत

गांधी दश्शन और आदिवासी जीवन-मूल्यों का संगम प्रकृति के सार् सह-अब्स्तत्ि, सामुदायिक सहयोग और श्रम के सम्मान पर टिका है । गांधी का स्िराज और आदिवासी परंपरा दोनों ही सत्ा व पूंजी के बजाय अंतिम व्यब्क्त, स्र्ानीय निर््णय और आत्मवनभ्शरता को विकास का केंद्र मानते हैं । आधुनिक तकनीक और इस पारंपरिक चेतना का तालमेल ही टिकाऊ और समावेशी भारत का आधार बन सकता है ।
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