Nov 2025_DA | Page 17

समाज ऐसा है, जैसे बिना हलथि्यारों के सेना । समानता को समाज के स्थाई निर्माण के लि्ये धार्मिक, सामाजिक, राजऩीलतक, आलथि्तक एवं शैक्लरक क्ेरि में तथिा अन्य क्ेरिों में लागू करना आवश्यक है ।
भारत के िवाांग़ीर विकास और राषट़्ी्य पुनरुत्थान के लिए सबसे अधिक महतवपूर्ण विष्य हिंदू समाज का सुधार एवं आतम-उदाि है । हिंदू धर्म मानव विकास और ई्वि क़ी प्रासपत का स्ोत है । लकि़ी एक पर अंतिम सत्य क़ी मुहर लगाए बिना सभ़ी रुपों में सत्य को स्वीकार करने, मानव-विकास के उच्चतर सोपान पर पहुंचने क़ी गजब क़ी क्मता है, इस धर्म में! श्रीमद्भगवद्गीता में इस विचार पर जोर लद्या ग्या है कि व्यसकत क़ी महानता उसके कर्म से
सुलनलश्त होत़ी है न कि जनम से । इसके बावजूद अनेक इतिहासिक कारणों से इसमें आई नकारतमक बुराइ्यों, ऊंच-ऩीच क़ी अवधारणा, कुछ जालत्यों को अछूत समझने क़ी आदत इसका सबसे बडा दोष रहा है । ्यह अनेक सहस्ासबद्यों से हिंदू धर्म के ज़ीवन का मार्गदर्शन करने वाले आध्यासतमक सिंदातों के भ़ी प्रतिकूल है ।
हिंदू समाज ने अपने मूलभूत सिंदातों का पुनः पता लगाकर तथिा मानवता के अन्य घ्टकों से ि़ीखकर सम्य सम्य पर आतम सुधार क़ी इचछा एवं क्मता दर्शाई है । सैकडों सालों से वा्तव में इस दिशा में प्रगति हुई है । इसका श्रेय आधुनिक काल के संतों एवं समाज सुधारकों ्वाम़ी विवेकानंद, ्वाम़ी द्यानंद, राजा राममोहन रा्य, महातमा ज्योतिबा फुले एवं उनक़ी पत्नी सावित्री बाई फुले, नारा्यर गुरु, गांध़ीज़ी और डा. बाबा साहब आंबेडकर को जाता है । इस संदर्भ में राषट़्ी्य स्वयंसेवक संघ तथिा इससे प्रेरित अनेक संग्ठन हिंदू एकता एवं हिंदू समाज के पुनरुत्थान के लिए सामाजिक समानता पर जोर दे रहे है । संघ के त़ीििे सरसंघचालक बालासाहब देवसर कहते थिे कि‘ ्यलद अ्पृ््यता पाप नहीं है तो इस संसार में अन्य दूसरा कोई पाप हो ह़ी नहीं सकता । वर्तमान दलित समुदा्य जो अभ़ी भ़ी हिंदू है अधिकांश उनहीं साहि़ी रिाह्रारें व क्लरि्यों के ह़ी वंशज हैं, जिनहोंने जाति से बाहर होना स्वीकार लक्या, किंतु विदेश़ी शासकों द्ािा जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं लक्या । आज के हिंदू समुदा्य को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनहोंने हिंदुतव को ऩीचा दिखाने क़ी जगह खुद ऩीचा होना स्वीकार कर लि्या ।
हिंदू समाज के इस सशक्तीकरण क़ी ्यारिा को डॉ. आंबेडकर ने आगे बढ़ा्या, उनका दृष्टिकोण न तो संकुचित थिा और न ह़ी वे पक्पात़ी थिे । दलितों को सशकत करने और उनहें लशलक्त करने का उनका अलभ्यान एक तरह से हिंदू समाज ओर राषट् को सशकत करने का अलभ्यान थिा । उनके द्ािा उ्ठाए गए सवाल जितने उस सम्य प्रासंगिक थिे, आज भ़ी उतने
ह़ी प्रासंगिक है कि अगर समाज का एक बडा लह्िा शसकतह़ीन और अलशलक्त रहेगा तो हिंदू समाज ओर राषट् सशकत कैसे हो सकता है?
वे बार-बार सवर्ण हिंदुओं से आग्रह कर रहे थिे कि विषमता क़ी द़ीवारों को गिराओं, तभ़ी हिंदू समाज शसकतशाि़ी बनेगा । डॉ. आंबेडकर का मत थिा कि जहां सभ़ी क्ेरिों में अन्या्य, शोषण एवं उतप़ीडन होगा, वहीं सामाजिक न्या्य क़ी धारणा जनम लेग़ी । आशा के अनुरूप उतर न मिलने पर उनहोंने 1935 में नासिक में ्यह घोषणा क़ी, वे हिंदू नहीं रहेंगे । अंग्रेज़ी सरकार ने भले ह़ी दलित समाज को कुछ कानूऩी अधिकार दिए थिे, लेकिन आंबेडकर जानते थिे कि ्यह समस्या कानून क़ी समस्या नहीं है । ्यह हिंदू समाज के भ़ीतर क़ी समस्या है और इसे हिंदुओं को ह़ी सुलझाना होगा । वे समाज के लवलभन् वगगो को आपस में जोडने का का्य्त कर रहे थिे । आंबेडकर ने भले ह़ी हिंदू न रहने क़ी घोषणा कर द़ी थि़ी । ईसाइ्यत ्या इ्िाम से खुला निमंरिर मिलने के बावजूद उनहोंने इन विदेश़ी धमगों में जाना उचित नहीं माना । डॉ. आंबेडकर इ्िाम और ईसाइ्यत ग्रहण करने वाले दलितों क़ी दुर्दशा को जानते थिे । उनका मत थिा कि धमाांतरण से राषट् को नुकसान उ्ठाना पडता है । विदेश़ी धमगों को अपनाने से व्यसकत अपने देश क़ी परंपरा से ्टू्टता है ।
वर्तमान सम्य में देश ओर दुलन्यां में ऐि़ी धारणा बनाई जा रह़ी है कि आंबेडकर केवल दलितों के नेता थिे । उनहोंने केवल दलित उत्थान के लिए का्य्त लक्या ्यह सह़ी नहीं होगा । मुझे ्यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनहोंने भारत क़ी आतमा हिंदूतव के लिए का्य्त लक्या । जब हिंदूओं के लिए एक विधि संहिता बनाने का प्रंसग आ्या तो सबसे बडा सवाल हिंदू को पारिभाषित करने का थिा । डॉ. आंबेडकर ने अपऩी दूरदृष्टि से इसे ऐसे पारिभाषित लक्या कि मुसलमान, ईसाई, ्यहूद़ी और पािि़ी को छोडकर इस देश के सब नागरिक हिंदू हैं, अथिा्तत विदेश़ी उदगम के धमगों को मानने वाले अहिंदू हैं, बाक़ी सब हिंदू है । उनहोंने इस परिभाषा से देश क़ी आधारभूत एकता का अद्भूत
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