Nov 2025_DA | Page 18

कवर स्टोरी

उदाहरण पेश लक्या है ।
अमबेकडर का सपना भारत को महान, सशकत और ्वावलंब़ी बनाने का थिा । डॉ. आंबेडकर क़ी दृष्टि में प्रजातंरि व्यवस्था िवगोतम व्यवस्था है, जिसमें एक मानव एक मूल्य का विचार है । सामाजिक व्यवस्था में हर व्यसकत का अपना अपना ्योगदान है, पर राजऩीलतक दृष्टि से ्यह ्योगदान तभ़ी संभव है जब समाज और विचार दोनों प्रजातांलरिक हों । आलथि्तक कल्याण के लिए आलथि्तक दृष्टि से भ़ी प्रजातंरि जरुि़ी है । आज लोकतांलरिक और आधुनिक दिखाई देने वाला देश, आंबेडकर के संविधान सभा में लक्ये गए सत्त वैचारिक संघर्ष और उनके व्यापक दृष्टिकोण का नत़ीजा है, जो उनक़ी देख-रेख में बनाए गए संविधान में लक्र्यासनवत हुआ है, लेकिन फिर भ़ी संविधान वैसा नहीं बन पा्या जैसा आंबेडकर चाहते थिे, इसलिए वह इस संविधान से खुश नहीं थिे । आखिर आंबेडकर आजाद भारत के लिए कैसा संविधान चाहते थिे?
आंबेडकर चाहते थिे कि देश के हर बच्चे को एक समान, अनिवा्य्त और मुफत शिक्ा मिलऩी चाहिए, चाहे व लकि़ी भ़ी जाति, धर्म ्या वर्ग का क्यों न हो । वे संविधान में शिक्ा को मौलिक अधिकार बनवाना चाहते थिे । देश क़ी आध़ी से ज्यादा आबाद़ी बदहाि़ी, गि़ीब़ी और भूखमि़ी क़ी रेखा पर अमानव़ी्य और असांस्कृतिक ज़ीवन ज़ीने को अभिशपत है । इस आबाद़ी क़ी आलथि्तक सुरक्ा सुलनलश्त करने के लिए ह़ी आंबेडकर ने रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने क़ी वकालत क़ी थि़ी । संविधान में मौलिक अधिकार न बन पाने के कारण 20 करोड से भ़ी ज्यादा लोग बेरोजगाि़ी क़ी मार झेल रहे है । बाबा साहब ने दलित वगगो के लिए शिक्ा और रोजगार में आिक्र दिए जाने क़ी वकालत क़ी थि़ी ताकि उनहें दूसरो क़ी तरह बराबर के मौके मिल सकें । अगर शिक्ा, रोजगार और आवास को मौलिक अधिकार बना लद्या जाता तो उनहें आिक्र क़ी वकालत क़ी शा्यद जरूरत ह़ी न होत़ी ।
डॉ. आंबेडकर प्रजातांलरिक सरकारों क़ी कम़ी
से परिचित थिे, इसलिए उनहोंने सधारण कानून क़ी बजा्य संवैधानिक कानून को महतव लद्या । मजदूर अधिकारों पर डॉ आंबेडकर का मानना थिा कि वर्ण व्यवस्था केवल श्म का ह़ी विभाजन नहीं है, ्यह श्लमकों का भ़ी विभाजन है । दलितों को भ़ी मजदूर वर्ग के रूप में एकलरित होना चाहिए । मगर ्यह एकता मजदूरों के ब़ीच जाति क़ी खाई को लम्टा कर ह़ी हो सकत़ी है । आंबेडकर क़ी ्यह सोच बेहद क्रांतिकाि़ी है, क्योंकि ्यह भारत़ी्य समाज क़ी सामाजिक संरचना क़ी सह़ी और वा्तलवक समझ क़ी ओर ले जाने वाि़ी कोशिश है ।
आंबेडकर भारत़ी्य दलितों का राजऩीलतक सशक्तीकरण चाहते थिे । उि़ी का नत़ीजा है कि आज लोकसभा क़ी 79 ि़ी्टें अनुसूचित जालत्यों के लिए और 41 ि़ी्टें अनुसूचित जनजालत्यों के लिए आिलक्त क़ी गई है । सरकार ने संविधान संशोधन कर ्यह राजऩीलतक आिक्र 2026 तक कर लद्या है । शुरू में आिक्र केवल 10 वर्ष के लिए थिा । ्यह राजऩीलतक आिक्र इन
समूहों का कितना सशक्तीकरण कर पा्या हैं, ्यह आज के सम्य का एक बडा सवाल है । अपना जनसमथि्तन खो देने के डर से कोई भ़ी राजऩीलतक दल इस पर चर्चा नहीं करना चाहता ।
देखा जाए, तो दल-बदल कानून के रहते ्यह संभव ह़ी नहीं है कि कोई दलित-आदिवाि़ी विधा्यक ्या संसद अपऩी मजटी से वो्ट कर सके । हमने देखा है कि कुछ साल पहले लोकसभा में दलित-आदिवाि़ी सांसदों ने एक फोरम बना्या थिा, इन वगगो के अधिकारों के लिए, पार्टी लाइन से ऊपर उ्ठकर । दल-बदल कानून के कारण वह बेअसर रहा है । आंबेडकर दूरदशटी नेता थिे उनहें अहसास थिा कि इन समूहों को बराबि़ी का दर्जा पाने के लिए बहुत सम्य लगेगा, वे ्यह भ़ी जानते थिे कि सिर्फ आिक्र से सामाजिक न्या्य सुलनलश्त नहीं लक्या जा सकता । हमने देखा है कि पूर्व राषट्पति ज्ाऩी जैल सिह, बाबू जगज़ीवन राम, मा्यावत़ी ज़ी, आदि दलित-पिछडे नेताओं पर किस तरह के जुमले और फिकरे गढ़े जाते रहे हैं ।
18 uoacj 2025