में भारत़ी्य इतिहास और भारत़ी्य राजऩीलत क़ी एक झांक़ी कहा जा सकता है ।’
ह्ाट कांग्ेस ए्ड गांधी हैव डन टू दी अनटचेबिलस
्यह पु्तक भ़ी 1945 में ह़ी प्रकाशित हुई । इसमें कांग्रेस और गांध़ी द्ािा अछूतों के लिए लक्ये ग्ये कार्यों का लेखा-जोखा प्र्तुत लक्या ग्या है तथिा सह़ी का्य्त न करने के लिए उनक़ी अचछे से खबर ि़ी ग्य़ी है । इस पु्तक में ्यह बता्या ग्या है कि कांग्रेस पार्टी ने अछूतोदाि क़ी समस्या को अपने राजऩीलतक लक््यों क़ी प्रासपत का साधन मारि बना्या है । कांग्रेस ने अपने
अछूतोदाि का्य्तक्रम का जितना प्रचार लक्या, वा्तव में उतना काम नहीं लक्या । इि़ीलिए इस पु्तक में दलित वगगों से गांध़ी एवं गांध़ीवाद से सावधान रहने के लिए निवेदन लक्या ग्या है ।
हू वेयर दी शूद्राज
्यह ग्रन्थ 1946 में प्रकाशित हुआ । ्यह एक खोजपरक पु्तक हएै जिसमें शूद्रों क़ी उतपलत्त के इतिहास का लव्िेषण लक्या ग्या है । इसमें बता्या ग्या है कि‘ शूद्र’ शबद क़ी उतपलत्त मारि शासबदक नहीं है । उसका ऐतिहासिक समबनध है । आज जिनहें शूद्र कहा जाता है वे सू्य्तवंश़ी आ्य्त क्लरि्य लोग थिे ।
सटे्टस ए्ड ्माइनोरीटीज
्यह पु्तक मार्च 1947 में प्रकाशित हुई । अपऩी इस पु्तक में डा. आंबेडकर ने समाज क़ी समाजवाद़ी रूपरेखा प्र्तुत करने का प्र्यास लक्या है साथि ह़ी उनहोंने ्यह भ़ी आग्रह लक्या है कि राज्य समाजवाद को संविधान क़ी धाराओं द्ािा स्थापित लक्या जा्य ताकि विधाल्यका तथिा का्य्तपालिका के सामान्य का्य्त, उनहें परिवर्तित न कर सके । राज्य समाजवाद का व्यावहारिक रूप संसद़ी्य जनतंरि द्ािा ला्या जाना चाहिए, क्योंकि संसद़ी्य जनतंरि समाज के लिए सरकार क़ी न्या्योचित व्यवस्था है ।
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