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कवर स्टोरी

हो ग्या । कई ढंगों से ्यहां का धन लरिल्टश सरकार तथिा जनता के लाभ में जाने लगा ।
दी इवोलयूशन आफ दी प्रोविन्शियन फाइनेंस इन हरिटिश इंडिया
्यह पु्तक डा. आंबेडकर का वह शोध प्रबनध है, जिसे उनहोंने 1916 में कोलम्बिया ्यूनिवसिर्टी में प़ीएचड़ी लडग्ऱी के लिए प्र्तुत लक्या थिा । इसका प्रकाशन 1924 ई0 में हुआ । ्यह पु्तक महाराजा बड़ौदा नरेश श्रीमंत ि्याज़ी राव गा्यकवाड को समर्पित क़ी ग्य़ी है । उलिेखऩी्य है कि महाराजा ने ह़ी उनहें अमेरिका में शिक्ा ग्रहण करने हेतु भेजा थिा । ्यह पु्तक फाइनेंस से संबंधित है, जिसमें लरिल्टश नौकरशाह़ी का बुि़ी तरह से भणडािोड़ लक्या ग्या है ।
एनाहिलेशन ऑफ कासट
डा. आंबेडकर द्ािा लिखित ्यह बहुचर्चित पु्तक है, इसका प्रकाशन 1936 में हुआ । जात-पांत तोड़क मणडि द्ािा आ्योजित उसके वार्षिक अधिवेशन में लाहौर में मार्च 1936 में डा. आंबेडकर को अध्यक़्ी्य भाषण देने के लि्ये आमंलरित लक्या ग्या थिा, लेकिन मणडि के सदस्यों ने जब का्य्तक्रम से पूर्व डा. आंबेडकर के इस भाषण को देखा तो उनहें ्यह आपत्तिजनक लगा । मणडि के सदस्यों ने इस भाषण में परिवर्तन के लिए डा. आंबेडकर से अनुरोध लक्या, लेकिन डा. साहेब भाषण में कोई भ़ी परिवर्तन करने से ्पष्ट मना कर लद्या । अनततोगतवा मणडि के इस वार्षिक अधिवेशन के का्य्तक्रम को िद् कर लद्या । डा. आंबेडकर ने इि़ी भाषण को ज्यों का त्यों 1936 में‘ एनाहिलेशन ऑफ कास्ट’ के नाम से पु्तक के रूप में प्रकाशित करवा लद्या ताकि अधिक से अधिक लोग इसके बारे में जान सकें । ्यह पु्तक छो्ट़ी ि़ी है, लेकिन बहुत ह़ी गंभ़ीि है । इस पु्तक में डा. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के आधार पर उसके उनमूिन के संबंध में गंभ़ीि चर्चा क़ी है ।
रानाडे, गांधी ए्ड जिन्ा
जनवि़ी 1943 में डा. आंबेडकर ने पूना में एम. ज़ी. रानाडे के जनम समारोह के उपलक््य में एक व्याख्यान लद्या, जो आगे चलकर रानाडे, गांध़ी एवं जिन्ा के रूप में प्रकाशित हुआ । इस पु्तक में रानाडे, गांध़ी और जिन्ा के व्यसकततव का तुलनातमक अध्य्यन लक्या ग्या है तथिा बता्या ग्या है कि ना्यक पूजा( ह़ीिो वर्शिप) अच्छी बात नहीं है, क्योंकि अनततोगतवा वह समाज तथिा देश के हितों के लिए हानिकारक होत़ी है ।
थाट्स ऑन पाकिस्ान डा. आंबेडकर क़ी ्यह बहुचर्चित पु्तक
1945 में प्रकाशित हुई । ्यह वह सम्य थिा जब भारत के विभाजन को लेकर पूरे देश में हलचल मच़ी हु्य़ी थि़ी । इस पु्तक ने इस समस्या का उचित समाधान प्र्तुत करने क़ी दिशा में अपऩी महतवपूर्ण भूमिका निभा्य़ी । इस पु्तक के संबंध में डा. आंबेडकर लिखते हैं कि‘‘ पु्तक के नाम से ऐसा लगता है जैसे पालक्तान के बारे में एक सामान्य सा खाका खींचा ग्या है, जबकि इसमें उसके अलावा और भ़ी बहुत कुछ है । ्यह भारत़ी्य इतिहास और भारत़ी्य राजऩीलत के सामप्रदाल्यक पहलुओं क़ी एक लव्िेषणातमक प्र्तुलत है । इसका मकसद पालक्तान के क. ख. ग. पर प्रकाश डालना भ़ी है । इस पु्तक
12 uoacj 2025