Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | страница 75

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आ गया था. किला ने टदशा को कसकर अपने सीने से लगा मलया. शायद वो अपने िित्व से टदशा को सहारा देना चाहती थी. एक िााँ जो अपने बच्चे को हिेशा दुखों से दूर रखने की कोमशश करती है. जो बच्चे को हर परेशानी से ननकालती है.
आज उसके पास ऐसा कोई तरीका नही था श्जससे टदशा को राहत मिल सके. किला बेिी को चुप करते हुए बोली,“ बेिा अब जो है जैसा है उसे स्त्वीकार करो. चाहो तो िुझे जी भर कर गाली दे लो. िैं भी श्जदगी भर तुम्हारे दुखों का बदला न चुका सकू ीं गी. जो दुुःख तुिने सहे हैं वो िुझपर तुम्हारे एहसान बनकर रहेंगे.
तुम्हारे भाइयों पर भी एहसान बनकर रहेंगे. बेिी अब कोई ऐसा काि न करना श्जससे कु छ भी गलत हो. जो तुम्हारी ककस्त्ित िें भगवान ने मलखा था वो तुम्हें मिल गया. िेरी ककस्त्ित िें तुम्हें दुखी देखना मलखा था सो देख मलया.
बेिा भगवान हि तुि जैसी श्स्त्रयों की सुनता ही नही है. अगर सुनता तो हि को इस भींवर िें न फीं साता. लेककन जब तुि ककसी लडकी की िााँ बनो तो ककसी और को उस लडकी को न देना या तो उसे खुद पालना या उसका गला घोंि उसे िार डालना. क्योंकक िैंने तो तुम्हें बबाचद होते देख मलया. शायद तुि अपनी लडकी को इस हालत िें न देख सको.”
टदशा अपनी िााँ की बात सुनती जा रही थी. अपनी िााँ की िजबूररयाीं उसे पता थीीं लेककन शोभराज ने उसके टदिाग िें किला के खखलाफ जो जहर भर टदया था वो आज भी कायि था. लेककन िााँ को देख उसे लगता नही था कक उसकी िााँ वैसी हो सकती है जैसी शोभराज ने बताई थी. टदशा अभी कु छ कहती उससे पहले ही शोभराज किरे िें आ पहुींचा. आते ही बोला,“ चलो टदशा अब तुम्हारी ववदाई होनी है. लडककयााँ सो गयी क्या? इन्हें भी जगा लो.”
टदशा के सीने िें धुकधुकी दौड़ गयी. किला का टदल भी कु म्हला गया. थोड़ी ही देर िें टदशा की ववदाई हो गयी. आींसू तो उसके थिते ही न थे. लोग सिझते थे कक टदशा शोभराज के घर से जाने की वजह से रो रही है लेककन टदशा अपनी ककस्त्ित पर रोती थी. किला खड़ी खड़ी अपनी बेिी को ववदा होते देख रही थी. न गले मिलना और न शादी की ख़ुशी होना. बडा अजीब सा िींजर था. थोड़ी ही देर िें टदशा वहाीं खड़े लोंगों की आाँखों से ओझल हो गयी.
सुबह हो चुकी थी. किला अपने दोनों लडकों को ले शोभराज के घर से अपने गााँव की तरफ चल दी. वो ननदचयी शोभराज से टदशा की शादी के बारे िें एक शब्द भी न कह सकी. न कोई मशकवा करना और न कोई मशकायत करना. बस अपनी ककस्त्ित पर रोना.
भगवान को जी भर कर याद करना और िन भर के कोसना. एक दुखी स्त्री इससे ज्यादा क्या करे? एक टहरनी ककसी शेर से नही लड़ सकती. लड़ने की सोचे भी तो उसके बच्चे सािने पड़ जाएाँ. टहरनी डर के