Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 74

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देखने िें ककसी भयावह सपने जैसा था. साथ िें बैिे लडके को देख किला से खड़ा भी न हुआ गया. किला इस लडके से अपनी लडकी की शादी भगवान के कहने पर भी नहीीं करतीीं. आखखर लडकी के िेल का लड़का तो होना ही चाटहए था.
आज किला की सिझ िें आया कक शोभराज ने कभी इस लडके का फोिो उसे क्यों नही टदखाया था? क्यों वह एक भी बार यह न कह सका कक किला तू भी लड़का देख ले? आखखर टदशा तेरी लडकी है. लेककन आज किला के हाथ िें कु छ भी नही था. अपनी फू ल सी बच्ची को नरक िें जाते देख रही थी. हाथ से वक्त कफसलता जा रहा था. किला साड़ी िें अपना िुींह नछपाए मससकती जा रही थी. टदशा के आींसू भी रुक नही रहे थे.
किला श्जस टदन से अपनी ससुराल आई थी तब से लेकर आज तक वो दुुःख सह रही थी. आज उसकी बेिी की शादी उसके मलए एक ओर दुुःख ले आई थी. शादी सम्पन्न हो चुकी थी. टदशा को आींगन के बगल वाले किरे िें ले जाया गया.
किला का टदल हुआ कक जाकर एक बार टदशा से मिल ले. क्यों वो अपनी बेिी की शादी िें वेगानी बनी घुिती रहे? लेककन बेिी को क्या िुींह टदखाए? क्या उससे पूींछे और क्या उससे कहे. सब कु छ तो लुि गया था. परन्तु बेिी से न मिलना भी तो किला को चैन से नही रहने दे रहा था.
किला आींगन से उिी और बगल के किरे िें जा घुसी. इस किरे िें इस वक्त टदशा के साथ दो लडककयााँ और थीीं. दोनों लडककयााँ गहरी नीींद िें सो रहीीं थी. टदशा किरे िें पड़े बेड पर ननढाल हो पड़ी थी. िानो उसिें जान ही बाकी न रही हो. किला किरे िें पहुींच टदशा के बगल िें बैि गयी.
टदशा ने सर उिाकर ये भी न देखा कक किरे िें कौन आया है. किला ने अपने ििता भरे हाथ से टदशा के सर को सहलाया. दुखी टदशा को ये स्त्पशच बड़ा सुखदाई लगा. लगा जैसे इसी की जरूरत थी. जैसे पहले भी इस स्त्पशच को कभी अनुभव कर चुकी है. उसने िुींह उिाकर देखा तो ये उसकी खुद की िााँ किला थी. टदशा को कफर से रोना आ गया. वो िााँ से मलपि फफक फफक कर रो पड़ी.
िााँ भी कब अपनी बेिी को रोते देख चुप रह सकती थी. वो भी फू ि फू ि कर रो पड़ी. दो दुखी श्स्त्रयों के िामिचक रुदन से किरे का वातावरण दुखों के धुींए से भर गया. टदशा िााँ से मलपिी रो रही थी.
िुींह से मसफच एक बात ननकलती थी,“ िााँ तुिने िेरे साथ िीक नही ककया. तुि चाहतीीं तो आज िैं इस तरह न होती. िााँ िें बाकी की श्जन्दगी कै से जीऊाँ गी? इससे अच्छा तो तुि िुझे पैदा होते ही िार देतीीं. िुझे श्जन्दा रख नरक िें धके लने की क्या जरूरत थी? िााँ िैं अब क्या करूीं? तुि िुझे अपने पास ही क्यों न रख सकीीं?”
किला भी रो रही थी लेककन उसका रोना टदशा से अलग था. शायद बार बार रोने से उसे चुप रहकर रोना