Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 72

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उिा मलया था.
किला को अपनी टदशा को देखने की हूाँक उि रही थी. सोचती थी पता नही लडकी ककतनी दुखी हो रही होगी. किला के पैर नही पड़ते थे कक टदशा की शादी िें जाए लेककन वो उसकी खुद की बेिी थी. नौ िहीने अपनी कोख िें रख उस बेिी को जन्ि टदया था.
उसके मलए किला ने प्रसव का ददच सहा था. वो उसने िृतक पनत की ननशानी थी. वो लडकी किला का खून थी. श्जसे किला कभी टदल से लगा कर सुला न सकी थी. श्जसे बड़ा होते भी किला देख न सकी थी. ये वही टदशा थी. किला ने दस तारीख को शोभराज के घर जाने का फै सला कर मलया.
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आज दस तारीख थी. नौ तारीख की रात को किला की आाँख से आाँख न लगी थी. सारी रात बस टदशा को सोच सोच कर रोती रही. सुबह होते ही शहर चलने की सारी तैयारी कर डालीीं. किला के साथ उसके दोनों छोिे लडके भी जा रहे थे लेककन अींनति सिय पर किला को ध्यान आया कक छोिे बच्चों पर पहनने के मलए कपड़े तो हैं ही नही.
आगरेवाली के लडके से पैसे तो ले मलए थे लेककन पैसों से कपड़ा तो शहर जाकर ही मिलना था. अब टदक्कत ये थी कक बच्चे शहर तक क्या पहन कर जाएाँ लेककन छोिू बहुत फु ती से अपने साथ पढने वाले लडकों के पास गया और अपने और छोिे भाई के मलए एक एक जोड़ी िीक िाक से टदखने वाले कपड़ों का इतींजाि कर लाया.
दोनों लडकों ने कपड़े पहने. कपड़े तो नाप के थे लेककन कयाि पर जूते नही थे और छोिू पर फिे हुए जूते थे जो ककसी ने उसे टदए थे. कयाि ने चप्पल पहनी और छोिू ने फिे हुए जूते कफर िााँ के साथ शहर की तरफ चल टदए.
जीतू को किला साथ लेकर नही जा रही थी. जीतू खुद भी जाना नही चाहता था. उसे इस शादी िें जाना ही रास न आया. किला से कहता था कक िैं अपनी आाँखों से अपनी बहन की दुगचनत होते नही देख सकता. किला को जीतू का श्जद्दीपना पता था. इसकारण वो उसे घर पर ही छोड़ कर जा रही थी.
किला बच्चों को ले शहर पहुींच चुकी थी लेककन बच्चों के मलए कु छ न मलया. न ही कपड़े और न कयाि के जूते. शोभराज का घर किला कई सालों पहले जब बीिार रणवीर को ले कर आई थी तब देखा था. किला शोभराज के घर पर पहुच गयी.
ज्यादा लोग तो नही आये थे लेककन आसपास के दो चार ररकतेदारों की भीड़ लगी हुई थी. किला के पहुींचने पर शोभराज ने दो चार बातें कीीं और कफर बाहर चला गया. शाि होने को आ रही थी. किला टदशा से मिलकर बात करना चाहती थी.