Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 68

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शोभराज के जाने के बाद किला कफर ख्यालों िें खो गयी. चार पाींच सालों से किला ने कोई साड़ी नही खरीदी थी. भाइयों को राखी बाींधने और दूज करने पर उसे कभी कभार साड़ी मिल जाती थी. बस उन्ही साडड़यों को तब से पहनती आ रही थी.
लडको के स्त्कू ल की ड्रेस भी बड़ी िुश्ककल से बनी थी तो उन्हें अच्छे कपड़े कहााँ से लाकर दे देती? बड़े लडके को कोई न कोई अपने पुराने कपड़े दे देता था. कफर उन्ही कपड़ों को छोिे बच्चे पहन लेते थे. सालों से कोई ऐसा काि न पड़ा था कक नये कपड़े बनबाने पड़ें.
अब तो किला को टदशा की शादी की भी धचींता थी. उसकी शादी ने कु छ देने को भी होना चाटहए था. आखखर खुद की बेिी थी. लोग तो दूसरे की बेिी की शादी िें भी कु छ न कु छ देते हैं लेककन क्या दे इस बात की बहुत धचींता हो रही थी.
लडकों के मलए कपड़े बनबाने के मलए भी पैसों की जरूरत पडनी थी. कि से कि एक एक जोड़ी िीक िाक से कपड़े तो होने ही चाटहए और शोभराज तो कहकर गया था कक िीक िाक से कपड़े ही पहन कर आना.
आज दो तारीख थी लेककन किला को पैसों का कोई प्रबींध न टदखता था. बड़े लडके जीतू को पडोस के गााँव की एसिीडी बूथ पर भेज अपने िायके फोन कराया लेककन वहाीं भी पैसों का कोई जुगाड़ नही था. आटदराज से िाींगने का तो सवाल ही नही उिता था.
शाि के सिय किला चौके िें बैिी थी. आिा गुींथा हुआ सािने रखा था. चूल्हे िें आग सुलग रही थी. जलते चूल्हे पर रखा काले रींग का तवा गिच होकर लाल हो रहा था लेककन किला की टहम्ित रोिी बनाने की नही होती थी. क्योंकक बच्चों को भूख तो लग रही थी लेककन खाना खाने का िन ककसी का नही था. खुद किला भी खाना बनाने की टहम्ित न कर पा रही थी.
श्जस घर की लडकी की शादी हो और उस घर िें इतने भी रूपये न हों कक वो िीक से कपड़े भी खरीद कर पहन सकें. उस घर की ऐसी हालत होना स्त्वभाववक थी. उसी सिय किला के घर का दरवाजा ककसी ने बजा टदया.
जीतू जाकर दरवाजा खोल आया. िोहाल्ले की एक औरत किला से कु छ बात करने आई थी. इस औरत को लोग उसके शहर के नाि से पुकारते थे. वो आगरा शहर की थी तो लोग उसे आगरेवाली कहकर बुलाते थे. आगरेवाली आकर किला के चौका के पास आ बैि गयी.
आई तो अपने ककसी काि से थी लेककन किला और बच्चों को उदास देख पूींछ बैिी,“ अरे किला तुि आज उदास सी कै से लग रही हो और अभी तक खाना भी नही बनाया? क्या बात है?” किला आगरेवाली को बताना तो न चाहती थी लेककन दुुःख बााँिने से कि होता है और लोग दूसरे को अपना दुुःख बताने से िन िें हल्कापन भी िहसूस करते हैं.