Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Página 65
65
भी नही थे कक तेरा पेि भर सकें . तेरी शादी के दहे ज़ की तो बात ही बहुत द र ू हो जाती है . ”
टदशा कफर फीकी हाँसी हाँसते हुए बोली, “पढाई के नाि पर तो िैंने एक अिर भी नही पढ़ा िााँ . यहााँ स
ले जाते ही इन लोगों ने िुझे घर के कािों पर लगा टदया. पढाई मलखाई का तो कभी श्जक्र भी नही ककया.
इससे तो बटढया िें यही रहती तो िीक था.”
किला है रत के िारे िरी जाती थी. शोभराज ने उसे वादा ककया था कक वो टदशा को पढ़ायेगा मलखायेगा.
अपनी बेिी की तरह रखेगा लेककन सब झूि था. कोरा झूि . उसके साथ धोखा हुआ था. सरासर धोखा. लेककन
अब सिय बहुत आगे बढ़ गया था. खेत को धचडड़या च ीं ु ग गयी थी. ग ज
रे हुए वक्त की भरपाई भी अब
नही हो सकती थी.
किला की आाँखों िें आींसू थे और टदशा भी भावुक थी. दो औरतें एक द स
रे से द ख
ों को बााँि रहीीं थी. ऊपर
से दोनों िााँ बेिी थीीं. वो िााँ और बेिी श्जनसे ए कद स
रे की कोई बात छुपी नही होती. किला ने टदशा के
सर पर बड़े प्यार से हाथ रखा.
टदशा आज कई सालों बाद िााँ के प्यार को िहसूस कर रही थी. बोली, “िााँ कही ये शादी भी तो ऐसा ही
धोखा तो नही होगी? अगर हुई तो कफर िैं क्या करुाँ गी? िेरी तो श्जन्दगी ही खराब हो जाएगी िााँ . ”
किला का टदल फिने को होता था. जो डर उसकी बेिी को था वही डर िााँ किला को भी था. लेककन किला
का टदल अब भी शोभराज को कि से कि इतना ननदचयी तो नही िानता था. वो अपने िन के साथ साथ
टदशा को सिझाती हुई बोली, “नही बेिा ऐसा कुछ नही होगा. भगवान इतना भी ननदचयी नही होगा कक
एक लडकी को कुए िें धकेल दे .
िैं तेरे मलए भगवान से भीख िाींगूींगी. कफर सब िीक हो जायेगा बेिा. तू धचींता ित कर. िैं अगर गरीब
न होती तो तुझे कभी इस तरह अपने से द र ू न रखती. िैं ख द
तेरी शादी करती लेककन बेिा एक औरत
का काि ही अपना त्याग कर द स
रों को सुखी करना होता है . तू भी एक औरत है . हो सकता है तेरे इस
त्याग से भगवान खुश हो तुझे बहुत अच्छे घर िें पहुींचा दे . ”
टदशा ने रोते हुए हााँ िें सर टहला टदया. टदल िें उम्िीद कफर से जागने लगी. शोभराज ने टदशा से किला
की बहुत सी बुराइयााँ कीीं थीीं . बहुत से लाींछन लगाये थे . टदशा तब किला के प्रनत बहुत क्रोध रखती थी
लेककन किला उसकी िााँ भी थी और िााँ के सािने आ टदशा कुछ भी न कह सकी.
अभी कुछ और बातें होतीीं उससे पहले शोभराज अपने लडके की बहू के साथ किला के घर आ पहुींचा और
बोला, “अरे भई िााँ बेिी िें क्या बातें हो रहीीं हैं?” टदशा और किला ने अपनी आाँखों से आींसू पोंछ मलए.
शोभराज आटदराज के घर से बहुत जल्दी चला आया था. शायद उसको डर था कक कही टदशा सारी बात
अपनी िााँ को न बता दे . किला शोभराज की बात का जबाब दे ती हुई बोली, “कुछ नही दद्दा. बस पुरानी