Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Seite 64

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सालों बाद किला के घर िें निकीन बबश्स्त्कि आया था. दूध तो कि था लेककन पानी बढ़ा कर किला ने चाय बना डाली.
किला के हाथ पैर फू ल रहे थे. बार बार अपनी फू ल सी बच्ची जो अब बड़ी हो चुकी थी उसको देखे ही जा रही थी. शोभराज के लडके की बहू पढ़ी मलखी थी. वो शोभराज के साथ ही चारपाई पर बैि गयी. गााँव के लोगों िें इस बात की बहुत घुसर पुसर हुई.
थोड़ी देर िें शोभराज और उसके लडके की बहू आटदराज के घर की तरफ चले गये. टदशा किला के पास ही रह गयी. किला चौका िें चूल्हे के सािने बैिी बैिी रोये जा रही थी. उसे अपनी बेिी की ककस्त्ित पर नाज़ हो रहा था. सोचती थी टदशा अच्छे घर िें पहुींच जाए इससे ज्यादा और क्या चाटहए.
टदशा चारपाई से उि चौका की तरह आ खड़ी हो गयी. किला ने झि से आींसू पोंछ मलए. िोहल्ले के लोग घर िें अब भी बैिे हुए थे लेककन चौका िें मसफच ये दोनो िााँ और बेिी ही थीीं. किला ने टदशा का हाथ पकड़ उसे अपने पास बबिा मलया और बोली,“ तू िीक है बेिा. तुझे शहर िें िेरी याद नही आती थी?”
टदशा का चेहरा भावहीन था. उसने किला की बात का जबाब न टदया. बोली,“ िााँ तुम्हारी गरीबी अभी तक वैसी की बैसी ही है. िेरे जाने के बाद से तो और ज्यादा बुरी हालत हो गयी है.”
किला टदशा की बात सुन शाींत सी हो गयी. वो अपनी बेिी को अपना दुुःख टदखाना नही चाहती थी. बोली,“ कोई बात नही बेिा. सब िीक हो जायेगा. अब तेरे भाई बड़े हो रहे हैं. ये लोग किाएींगे तो सारी गरीबी जाती रहेगी. ख़ैर तू सुना. तेरे बारे िें सुन िुझे बहुत ख़ुशी हुई. तुझे अच्छा घरवार मिल जायेगा. लड़का भी िीक मिल जायेगा. बस अब िुझे कोई धचींता नही. अच्छा टदशा तूने वो लड़का देखा है श्जससे तेरी शादी हो रही है.”
टदशा नतररस्त्कारपूणच हींसी हाँस बोली,“ नही िााँ. िैने अभी तक उस लडके को नही देखा लेककन एक दो जने ने िुझे बताया था कक लड़का िीक है. पर िुझसे तो पूींछा भी न गया कक िैं शादी करुाँ गी कक नही? सब तय करने के बाद िुझे मसफच बताया गया.
लेककन तुम्हें इस बात से क्या करना िााँ. तुिने तो एक बार भी िुझसे जाकर ये न पूींछा कक िैं कै सी हूाँ? न ही िुझसे मिलने आयीीं और आज पूींछती हो कक िैं तुम्हारी याद करती थी या नही? आप को क्या पता कक िैने क्या क्या सहा है? शायद आकर देखतीीं तो पता चलता.”
किला का टदन अपनी बेिी की बातों से कु म्हला गया. किला सोचती थी कक उसकी बेिी वहाीं बहुत खुश है लेककन टदशा की शादी अच्छे घर िें हो रही है ये सोच अब भी सींतोष था. बोली,“ चल बेिा िानती हूाँ िुझसे गलती हुई लेककन िैने शोभराज दद्दा से कई बार तुझसे मिलने की कही लेककन हर बार वो िाल देते थे. अब तुझे पढाया मलखाया और अच्छे घर िें शादी कर रहे हैं ये क्या कि है? बेिा हि तो इस लायक