Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Página 59
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कफर छोिू की तरफ दे खता हुआ बोला, “तख्त पर बैि जा भई. तेरी धचट्ठी ने िेरा िन बैचेन करके रख
टदया. क्या तूने खुद मलखी है ये धचट्ठी या ककसी और से मलखवा कर लाया है ?”
छोिू ने हााँ िें सर टहलाते हुए कहा, “जी िैने ही मलखी है . ” डाींकीया छोिू को बड़े ध्यान से दे खता हुआ बोला,
“यार तू तो बहुत परे शान है लेककन िैं तुझे एक बात सच सच बता द ाँ ू कक भगवान को कोई धचट्ठी नही
मलख सकता. वो कहााँ रहता है ये ककसी को पता नही लेककन सींत िहात्िा कहते हैं कक वो घि घि िें रहता
है . उसको कोई भी डाींकीया धचट्ठी नही पहुींचा सकता.
इसमलए बेिा ये चीट्ठी भगवान के पास नही पहुींच सकती. तू ये सब भूल कर अपनी पढाई मलखाई िें ध्यान
लगा. श्जससे तुझे कुछ मिल सके . िीक है . अब ये धचट्ठी ले और घर जा. आज के बाद कभी ये काि ित
करना. भगवान कभी ऐसे नही मिलते . उसके मलए भजन पूजा करनी पडती है . श्जसके मलए अभी तेरी उम्र
बहुत छोिी है . ”
इतना कह डाींकीया ने छोिू के हाथ िें बड़े प्यार से उसका मलखा हुआ मलफाफा पकड़ा टदया. इस सिय
डाींकीया को दे ख लगता नही था कक ये वही डाींकीया है श्जसने थोड़ी दे र पहले इस लडके के गाल पर थप्पड़
िार टदया था. छोिू वहाीं से अपना बुझा िन ले बाहर ननकल आया.
उसकी सारी उम्िीदें िूि गयीीं थीीं . दो टदन से जो उसका िन ख़ुशी से फूला न सिाता था वो आज नाउम्िीद
हो गया था. श्जस भगवान को लेकर उसके िन िें आशा जगी थी वो आज पल भर िें खत्ि हो गयी थी.
आज उसे लगता था कक द न ु नयाीं िें कोई ऐसा नही जो उसकी सुन सके और न ही कोई ऐसा है जो उसके
द ुः ु ख द र ू कर सके .
रास्त्ते िें आ छोिू ने मलफाफे के िुकडे िुकड़े कर डाले . सोचता था जब भगवान का कोई अता पता ही नही
तो उसकी सिस्त्या क्या सुनेगा. उसे मलफाफे िें खचच हुए उन दो रुपयों का भी िलाल हो रहा था जो खान
वाले गेहूाँ बेचकर मलए थे .
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