Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | страница 55
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से इतनी टहिाकत न की थी.
लेककन बाबा को इस बात से ग स्त्
सा की जगह है रत ज्यादा हुई . वो बैिा बैिा उस नन्हे लडके को दे खता
रह गया. अघोरी बाबा का सारा अघोरीपन धरा रह गया था. हकीकत ये थी कक खुद बाबा को भगवान का
पता जानने की उत्सुकता हो उिी.
छोिू घर पहुींच चूका था. उसे भगवान का पता कहीीं भी न मिला. िन थका सा हो गया था लेककन कफर
छोिू को ध्यान आया कक डाकखाने वाले के पास भगवान का पता जरुर होता होगा. सोचता था लोग वहा
तो कभी न कभी भगवान को धचट्ठी मलखते ही होंगे . िन िें कफर से उम्िीद जाग च क
ी थी. छोिू ने द स
र
टदन डाकखाने जाने की सोच ली. धचट्ठी को छुपा कर रख टदया. श्जससे ककसी के हाथ वो धचट्ठी न लगन
पाए.
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द स
रे टदन छोिू अपने बड़े भाई जीतू के साथ पढने चला गया. दोपहर के बाद घर लौिा लेककन टदन भर
उस