Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 52

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कहानी सुनी थी कक भगवान को एक लडके ने धचट्ठी मलखी थी और भगवान ने उसे पैसा भेज टदया था. छोिू का भी िन करता था कक क्यों न वो भी भगवान को एक धचट्ठी मलखे.
श्जसिे भगवान उसे पैसा न दें तो कि से कि उसका दुुःख तो कि कर दें और भगवान के पास तो उसके वपता भी रहते थे. ऐसा उसकी िााँ किला उससे हिेशा कहा करती थी. हो सकता है भगवान उसके वपता को बहुत सारा पैसा दे कर उसके घर भेज दें?
छोिू ने धचट्ठी मलखने का िन तो बना मलया लेककन उसके पास मलफाफा लाने के मलए पैसे नही थे. उस सिय सादा धचट्टी का काडच पचास पैसे और मलफाफा दो रूपये का आता था. िााँ के पास जब एक रूपये के सादा पेन के मलए पैसे कि पड़ जाते थे तो धचट्ठी मलखने के मलए दो रूपये कहााँ से दे सकती थी. लेककन छोिू के टदिाग िें तरकीब आ गयी थी. श्जसे वो सोचते सोचते ही सो गया.
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सुबह हुई. किला बहुत जल्दी ही उि गयी थी. शायद रात िें नीींद ही नही आई थी. आज किला को घर से ननकलने का िन नही करता था. कल आटदराज द्वारा दी गयी गामलयााँ उसे अपना अपिान लगीीं थी. सोचती थी पता नही िोहल्ले की औरतें उसे देख ककस ककस तरह की बातें करेंगी. किला घर के काि ननपिाने िें लग गयी लेककन िन घोर ग्लानी से भरा रहा.
छोिू ने िााँ को काि करते देखा तो अपने मलफाफा लाने वाले प्लान िें लग गया. उसने चुपके से खाने के गेहूाँ वाली बोरी से दो ढाई रूपये के करीब के गेहूाँ ननकाले और चुपके से घर से ननकल गया. दानपुर गााँव के बगल वाले गााँव िें डाकखाना पड़ता था. श्जसकी दूरी इस गााँव से एक ककलोिीिर दूर थी.
छोिू पैदल पैदल ही उस गााँव के डाकखाने पर जा पहुींचा. एक बुडूढा सा आदिी उस डाकखाने पर बैिा था. ये डाकखाना कि भैंसों का तबेला ज्यादा लग रहा था. लेिर बोक्स पर भैंस की गोबर से सनी पूींछो के धडाधड पड़ने के ननशान बने हुए थे. उसी िें अींदर एक तख़्त पड़ा था श्जसपर डाकबाबू बुडूढा बैिा हुआ था.
छोिू ने जाते ही उससे कहा,“ बाबा जी एक पोस्त्िकाडच दे दीश्जये.” बुडूढे ने बड़े गौर से छोिू को देखा. िैले कपड़े और नींगे पैर वाले खड़े लडके को बुडूढे ने सबसे पहले पूींछा,“ पैसे हैं. दो रूपये का आता है. ला पैसे दे.”
छोिू सहि कर बोला,“ िुझ पर पैसे तो नही हैं लेककन इतने से ज्यादा के गेहूाँ लाया हूाँ. गेहूाँ तोल कर देख लो. फ़ालतू हो तो िुझे बाकी का पैसा दे देना.” बुडूढा आाँखे तरेर कर बोला,“ ये कोई परचूनी की दूकान है जो गेहूाँ ले चला आया. जा बगल की परचूनी की दुकान पर गेहूाँ बेच कर पैसे लेकर आ. तब लेना मलफाफा.”
छोिू उस तबेले कि डाकखाने से ननकल थोड़े आगे वाली परचूनी की दुकान पर जा पहुींचा. दुकानदार ने