Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 45

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न होते. आपको इन बबना बाप के बच्चों पर जरा भी तरस न आया. कि से कि एक बार तो ये सोच लेते कक इन बच्चों को पेि भर खाना न देने और िारने से इन पर क्या बीतती होगी?
इनके टदल तुि लोगों को बददुआ देते होंगे. वैसे तो बड़े कहते थे कक बटहन भाींजे बड़े िान्य होते हैं लेककन इन बच्चों से घर के काि से लेकर गोबर डालने तक का काि मलया जा रहा है. इतने बड़े बड़े लोग घर िें बैिे आराि से खा रहे हैं और ये बच्चे सब काि कर रहे हैं. इस जीतू के सर पर फोड़े हैं और उसी से बतचन भर भर कर पानी ढु लवाया जा रहा है. िुझे आप लोगों से इस तरह की उम्िीद न थी.”
इतना कहते कहते किला का गला भराच गया. रािचरन किला की बात सुन अवाक रह गये. उन्हें अपनी बेिी से इस तरह बात करने की उम्िीद नही थी लेककन रािचरन ने खुद जीतू और नन्ही की बुरी गनत होते देखी थी. कभी कभी तो उन्हें भी इन बच्चों पर तरस आ जाता था लेककन अपनी पत्नी सुशीला के डर से कु छ कह न सके थे.
किला की बात का सिचथन सा करते हुए रािचरन बोले,“ बेिा तो कि से कि आज की रात तो रुक जाओ. इस वक्त तुम्हारा जाना िीक भी नही है. रात िें बच्चों को ले कहााँ भिकती कफरोगी? िेरे कहने से आज की रात रुक जाओ. कल सुबह ही चली जाना.”
किला का गुस्त्सा अपने वपता की बात से थोडा कि हो गया था. वो अपने वपता की बात सुन रुक गयी लेककन किला की िााँ सुशीला एक भी बात अपने िुींह से न कह सकी. किला के भाई भी िूक दशचक बने हुए यह सब देख रहे थे. वे लोग अपनी िााँ के स्त्वभाव से अच्छी तरह पररधचत थे.
किला दूसरे टदन सुबह अपने घर से दानपुर की मलए चल दी लेककन रािचरन ने किला से नन्ही को छोड़ जाने की बात कह दी. श्जससे सफर िें आराि से जा सकें. उन्होंने किला को भरोसा टदया कक वे एक दो टदन िें ही नन्ही को उसके पास मभजवा देंगे. किला िान तो गयी लेककन िन नही करता था कक नन्ही को इस घर िें एक टदन के मलए भी छोड़ दे. नन्ही भी बार बार िााँ की तरफ भीगी आाँखों से देख रही थी.
लेककन किला ने सफर की परेशानी की वजह से अपने वपता की बात िान ली. नन्ही को सब कु छ सिझाते हुए किला दानपुर के मलए चल दी. आज जीतू बहुत खुश था. उसके टहसाब से उसे जेल से छु िकारा मिल गया था. उसके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती थी लेककन उसे नन्ही की भी कफकर थी.
अगर उसका वश चलता तो नन्ही को यहााँ छोड़ता ही नही. उसे पता था यहााँ का एक एक टदन ककतना िुश्ककल होता है. नन्ही थोड़ी दुखी तो थी लेककन िन िें अपने वपता के घर िााँ के पास पहुींचने की आशा उसे टदल ही टदल िें खुश ककये जा रही थी.
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