Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 43

43 जीतू बात कहते कहते भावुक हो गया था. उसकी आाँखें छलछला उिीीं . जीतू के साथ साथ. नन्ही, छोिू और कयाि भी रोने लगे. अभी कोई कुछ कहता उससे पहले ही किला इन चारों के पास आ पहुींची. चारों ने एकदि से अपने अपने आींसू पोंछ मलए लेककन किला इन बच्चों की िााँ थी. वो जानती थी बच्चे अभी रो कर चुप हुए हैं . िााँ ने आते ही सबसे पहले अपने सबसे छोिे लडके कयाि को गोद िें ले मलया. चार साल का कयाि िााँ से धगलहरी के बच्चे की तरह मलपि गया. किला ने चारों बच्चों को अपने पास बबिा मलया और बोली, “अच्छा बेिा तुि लोग क्या बात कर रहे थे अभी और रो क्यों रहे थे? छोिू तू बता क्या बात थी?” छोिू ने जीतू की तरफ दे खा. जीतू नजर नीचे ककये हुए खड़ा था. छोिू िााँ से बोला, “िााँ भैय्या और नन्ही दोनों को नानी भरपेि खाना नही दे ती और िारती भी है . ये लोग िोहल्ले के आदमियों से रोिी िाींग िाींग कर खाते हैं . िााँ इन्हें अपने साथ अपने घर ले चलो न. वहाीं तो पेि भर खाना होता है . चाहे सब्जी न हो या घी से चुपड़ी रोिी न हो लेककन पेि भर सूखी रोिी तो है ही.” किला का टदल ये बात सुनते ही भर आया. उसने आते ही जीतू और नन्ही की हालत दे ख रखी थी. वो अपनी िााँ सुशीला का ननदचयी स्त्वाभाव भी बहुत अच्छी तरीके से जानती थी. किला ने जीतू और नन्ही को अपने सीने से धचपका मलया और जीतू को पूींछती हुई बोली, “जीतू िुझे सही सही बता. क्या सच ि नानी तुि दोनों को भूखा रखती है ?” जीतू ने िााँ की तरफ दे खा. आज जीतू िााँ से कोई भी बात छुपाना नही चाहता था. उसे अपनी िााँ से कोई डर नही था लेककन साल भर का ददच जब जीतू के अींदर से फूिा तो अपने आप को रोने से न रोक पाया. उसने मससकते हुए अपनी िााँ को सारी बात बतानी शुरू कर दी, “िााँ ये बात सच है . नानी हिें एकाध रोिी दे कर रोिी दे ने से िना कर दे ती है और जब हि ककसी और से रोिी िाींगें तो पता पड़ने पर हिें बहुत बुरी तरह से िारती भी है . िााँ अब हि लोग यहााँ नही रहना चाहते . हिें अपने घर ले चलो. जब भूखा ही रहना है तो यही क्यों रहें ? कि से कि अपने घर िें तो रहें गे . ” किला की आाँखें वहे जा रहीीं थीीं . कलेजा बच्चों के ददच को िहसूस कर फिा पड़ता था. किला ने इन दोनों बच्चो को यहााँ इसमलए भेजा था ताकक बच्चे चैन से रह सकें लेककन यहााँ तो बच्चों की घर से भी ज्यादा बुरी हालत थी. किला सोच ही रही थी कक जीतू सुपकता हुआ कफर बोल पड़ा, “िााँ अभी एक टदन पहले ही करवाचौथ पर बड़ी िािी ने एक बतचन िें दो पराींिे रख टदए थे . श्जनिें एक कुत्ते के मलए था और द स रा गाय के मलए. लेककन रात िें भूख लगने पर एक पराींिा िैंने खा मलया और द स रा नन्ही ने िेरे कहने पर भी नही खाया था.