Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 41
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आज काि पर नही लगाते .
किला की िााँ स श
ीला बहुत ननदचयी थी. बच्चों से इस तरह काि कराने का करतब उसी का था. किला
को कि से कि अपनी सगी िााँ से इस बात की उम्िीद नही थी लेककन किला कफर भी चुप रही. उसन
बच्चों को कलेजे से लगा चुप करा टदया.
जीतू और नन्ही सुबह से भूखे थे . सुशीला ने उन्हें एक एक रोिी दे शाि तक के मलए िाल टदया था और
साल भर से यही कर रही थी. दोनों बच्चों के शरीर पहले से भी किजोर हो गये थे . जीतू अपने छोिे भाई
बटहनों को ले घर से बाहर आ गया.
जीतू ने गााँव से आये अपने भाइयों से बोला, “छोिू कयाि तुि लोगों को भूख लगी होगी?” भूख तो सचिुच
िें दोनों को लगी थी और भूख जीतू और नन्ही को भी लगी थी. छोिू से पहले कयाि बोल पड़ा, “हााँ भैय्या
भूख तो लगी है लेककन नानी तो तुिको ही रोिी नही दे ती कफर हि लोगों को कहााँ से रोिी मिलेगी?”
जीतू कयाि की तरफ दे खता हुआ बोला, “उसकी धचींता ित करो. िैंने चार रोटियों का इींतजाि कर रखा
है लेककन लानी तुिको ही पडेगीीं . छोिू तू ले कर आ. दे ख भैंसों के रहने वाले िकान िें धरती पर एक
गोबर के कूड़े का ढे र लग रहा होगा. उस ढे र को कुरे दने पर तुझे चार रोिी मिल जाएगी. फिाफि जा उनको
ले आ. कफर चारो जनें मिल कर खायेगें . ” छोिू ने नाक मसकोड़ कर अपने बड़े भाई जीतू से कहा, “नछुः.
गोबर िें रखी हुई रोटियाीं खाओगे भैय्या? सब गोबर िें सन गयी होंगी?”
जीतू उसे सिझता हुआ बोला, “अरे नही. वो गोबर का नही सूखे हुए कूड़े का ढे र है . रोिी टहलाने पर सारा
कूडा रोटियों से साफ़ हो जायेगा. अब फिाफि से जा और चारो रोिी बड़ी सावधानी से लेकर आजा.” छोिू
अपने भाई के कहने पर चल तो टदया लेककन उसका िन नघन से भर रहा था. सोचता था भाई भी ककतनी
गींदी जगह से ननकाल रोिी खा लेता है .
छोिू भागकर भैंसों वाले घर िें पहुींचा. जहााँ कूड़े के दो ढे र लगे हुए थे . छोिू ने दोनों को कुरे द कर दे खा.
उनिे से एक ढे र िें चार रोटियाीं एक जगह रखी हुई मिल गयी. रोिी बेहद हल्की हल्की और घी से चुपड़ी
हुई थीीं . छोिू को उन रोटियों िें लगे दे शी घी की सुगींध वावला ककये दे रही थी.
उसने रोटियों को िीक से झाड़ा और उनिे से एक रोिी को खा मलया. भूख तो पहले से लग ही रही थी
ऊपर से घी की भीनी सुगींध ने उसे ललचा टदया. लेककन एक रोिी को खा उसकी भूख न बुझी. उसने द स
री
भी खाली. कफर तीसरी और चौथी भी खा ली लेककन पेि की भूख अब भी न बुझी. रोिी थी हीीं इतनी हल्की.
चारों रोटियाीं खाने के बाद छोिू को ध्यान आया कक अब बाकी के लोग क्या खायेंगे? छोिू डरता हुआ उन
तीनों के पास जा पहुींचा.
जीतू, नन्ही और कयाि छोिू को आते हुए दे ख रहे थे और जैसे ही छोिू उनके पास पहुींचा तो जीतू ने सबस