Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 39

39
साल गुजर रहे थे. अब छोिू पडोस के गााँव वाले सरकारी स्त्कू ल की दूसरी क्लास िें पढ़ रहा था. गााँव के सब बच्चे टिकफन िें खाना लेकर जाते थे लेककन छोिू के घर टिकफन नही था. किला छोिू के मलए एक पुराने से रुिाल िें रोटियाीं बााँध देती थी. जो स्त्कू ल तक जाते जाते चिचोड़ हो जाती थीीं.
साथ िें नीींबू या आि का अचार होता था. लेककन अन्य बच्चे स्त्कू ल िें खुसबूदार सब्जी भी लेकर आते थे. परन्तु छोिू के घर तो तीन चार टदन बाद ही सब्जी पकती थी. बाकी के टदन अचार या हरे धननये और हरी मिची वाली चिनी से काि चलाना पड़ता था.
छोिू के मलए तो स्त्कू ल की पटट्टका पर मलखने के मलए खडडया भी नही होती थी. वो गााँव की बेरी के बेर तोड़ कर स्त्कू ल िें ले जाता और उनके बदले स्त्कू ल के लडके उसे खडडया देते थे. छोिू को सरकारी स्त्कू ल िें भेजने कारण एक और था.
बच्चों को स्त्कू ल की तरफ से तीन ककलो गेंहूाँ मिलते थे. श्जनिे एक ककलों िास्त्िर साहब खा जाते थे और बाकी का दो ककलों बच्चों को मिल जाता था. किला सोचती थी कक दो ककलो गेहूाँ भी कि नही हैं. साथ ही पढाई भी पढने को मिलती है. बस इसी बात से छोिू को सरकारी स्त्कू ल िें पढ़ने बबिा टदया था.
टदशा को किला के पास से जाए कई साल हो चुके थे लेककन न तो शोभराज टदशा को लेकर किला के पास आया और न ही किला अपनी गुरवत के चलते टदशा को देखने जा पायी. शहर तक जाने का ककराया भी किला के पास नही हो पाता था. और होता भी था तो उसिें छोिे बच्चों की स्त्कू ल की फीस जो िहीनों पहले से चली आ रही होती थी वो अदा होती थी.
उधर टदशा अपनी िााँ से मिलने के मलए खूब रोती थी. रोज शोभराज से कहती कक उसे िााँ के पास ले चले लेककन शोभराज रोज कु छ न कु छ बहाने लगाकर टदशा को िाल देता था. साथ ही टदशा को किला के खखलाफ भडकाने िें भी कोई किी न छोड़ता था.
शोभराज टदशा को बताता कक किला उसे अपने पास बुलाना ही नही चाहती और न ही उसे टदशा की कोई याद ही आती है. धीरे धीरे टदशा के टदिाग िें अपनी िााँ के प्रनत गुस्त्सा बढ़ता जा रहा था. ककन्तु िन कफर भी एक बार अपनी िााँ से मिलने के मलए करता था. िन िें सौ मशकायतें थीीं और सौ ददच. आखखर इन सबको बयान करने के मलए भी तो िााँ सािने होनी चाटहए थी.
लेककन ऐसा नही था कक किला को अपनी लाडली की याद न आती हो. वो छु प छु प कर टदशा को याद करती थी और खूब जी भरकर रोती थी. किला के अपने पाींच बच्चों िें से तीन बाहर रह रहे थे और दो छोिे छोिे उसके पास रह रहे थे. दो सौतेली बेटियों िें से कोई भी किला के पास न आ पाती थी. सीिा दानपुर िें घूिने आती भी थी लेककन सीधी आटदराज के घर आ कर रूकती.
किला का घर सीिा के बाप का घर था लेककन सीिा किला को अपनी सौतेली िााँ ही िानती थी. आटदराज