Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 31
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को सुन भर आया था. अभी टदशा की उम्र ही क्या थी लेककन गुरबत ने उसके टदिाग को गहन सोच सोचन
के मलए िजबूर कर टदया था.
किला ने टदशा को एक बार कफर से अपने सीने से लगा मलया. टदशा ने सब लोगों को सुखी दे खने के
मलए खुद को द ख
ी कर मलया था. शायद एक लडकी अपने घर वालों के मलए यह सब करके गवच िहसूस
करती होगी. शायद औरत को हर िुश्ककल और बुरे वक्त िें ख द
को नौछावर करने िें जरा भी टहचक नही
होती होगी.
सिय बीत रहा था. किला दे वी और टदशा के साथ साथ घर के अन्य बच्चों के टदलों की धडकनें भी अननयींबरत
हो रही थी. जीतू जो रोज टदशा से लड़ता था वो आज टदशा से बड़े प्यार से बातें कर रहा था. चूल्हे पर
रखे छोिे से धगलास िें उबला हुआ द ध
रखा था.
जीतू ने उस धगलास की िलाई चम्िच से उतार टदशा की तरफ बढ़ा दी और बोला, “ले टदशा तू ये िलाई
खा ले पता नही वहाीं तुझे िलाई मिल पायेगी या नही?” टदशा भौचक्की हो अपने छोिे भाई जीतू की तरफ
दे ख रही थी. जो लड़का िलाई खाने मलए उससे रोज लड़ता था वो खुद आ उसे िलाई खाने के मलए कह
रहा था.
टदशा भी जीतू की ही बटहन थी. बड़े प्यार से बोली, “नही जीतू तू ही खा ले . वहाीं शहर िें तो द ध
की कोई
किी ही नही होती और ताऊ के घर तो पैसों की कोई किी ही नही है . िैं वहाीं बहुत अच्छी अच्छी चीज
खाऊाँगी.” इतना कह टदशा ने िलाई की चम्िच को अपने भाई की तरफ बढ़ा टदया. जीतू ने चाहते हुए
भी बटहन की बात न िाली. बटहन भाई का प्यार दे ख किला भावुक हो उिी. उन्हें अपने भूखे बच्चों स
इतनी उम्िीद तो कि से कि थी ही.
टदशा ने अपने छोिे भाइयों को ननहारा. श्जनिे एक तो िीक से बोल भी नही सकता था और द स
रा बुखार
से तप रहा था. टदशा ने दोनों को बारी बारी से द ल
ारा और ताऊ के