Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 30

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भी नही चाटहए. िैं यहीीं रहना चाहती हूाँ चाहे िुझे हिेशा भूखा ही क्यों न रहना पड़े.
िााँ क्या तुि को िैं अच्छी नही लगती. क्या िैं लडकी हूाँ इस मलए िुझे अपने से दूर भेज रही हो या िैं भी सीिा और लीला की तरह तुम्हारी सौतेली लडकी हूाँ जो िुझे भाइयों से कि प्यार करती हो? अगर ऐसा है तो िैं चली जाउीं गी. कफर िुझे कोई परेशानी नही.”
किला आाँखें फाड़ फाड़ कर अपनी िासूि बच्ची को देख रही थी. जो बात ये सगी लडकी कह रही थी ऐसी बात तो कभी सौतेली लडककयों ने भी नही कही थी. किला का टदल िानो ककसी पत्थर से कु चल गया था.
किला ने सािने बैिी अपनी बेिी टदशा को एकदि से अपने कलेजे से लगा मलया और उसके साथ खुद भी मससक मससक कर रोने लगी. िााँ बेिी को रोते देख बाकी के बच्चे भी िााँ के पास आ मलपि गये. उन्हें तो ये तक नही पता था कक ये लोग रो क्यों रहे हैं. बस िााँ रो रही है और बहन रो रही है यही इन सबके मलए काफी था.
किला ने चुप हो बाकी के बच्चों को भी चुप करा टदया. कफर टदशा के आींसू पोंछ बोली,“ बेिा तू नही जाना चाहती तो रहने दे. िैं भी तुझसे जबरदस्त्ती नही करना चाहती लेककन आज के बाद ये कभी ित कहना कक िें तुझे प्यार नही करती. अरे वावली िैं जो करने जा रही थी उसिे िेरा स्त्वाथच बस इतना था कक तेरी श्जन्दगी सम्हल जाती.
िैं तो नन्ही और जीतू को भी नानी के घर भेजने वाली हूाँ. कि से कि बाहर रहने से तुि सब लोगों के कष्ि तो कि हो सकते हैं. ये घर तो नरक की तरह हो गया है जहााँ इन्सान अपना पेि भर खाना भी नही खा सकता. तू नही जानती िेरी बच्ची कक िैं श्जस हालत िें हूाँ उस हालत िें तेरी शादी तो छोड़ तेरा पेि भी िीक से न भर पाऊाँ गी. पर तू ये सब नही चाहती तो रहने दे.”
इतना कह किला चुप हो गयी लेककन टदशा को अपनी बातों पर ग्लानी होने लगी. वो अपनी िााँ की िजबूरी को अच्छी तरह जानती थी. सोचती थी अगर वो लडकी न होती तो हिेशा िााँ के साथ ही रह कर उसकी सेवा करती. टदशा का िन भी बदलने लगा.
उसने िन ही िन ननणचय मलया कक वो शोभराज के साथ शहर चली जाएगी. श्जससे िााँ के कन्धों का बोझ हल्का हो सके. श्जससे उसके बााँि का खाना उसके बाकी के बटहन भाइयों को मिल सके. टदशा के मलए ये फै सला अपने आप को खत्ि करने जैसा था लेककन गरीबी और लाचारी से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका था.
टदशा अपना िन कड़ा कर िााँ से बोली,“ िााँ िुझे भी लगता है कक िुझे ताऊ के साथ शहर चले ही जाना चाटहए. तुि परेशान ित होओ िें अब वहाीं न जाने की श्जद न करुाँ गी.” किला का टदल टदशा की बातों