Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Seite 29
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टदशा पढ़ मलख कर ककसी अच्छे घर िें जा सकती थी. इससे ज्यादा किला को और क्या चाटहए था?
किला ने एक बार कफर से दीवार से टिकी खड़ी उदास टदशा को दे खा. जो आखों ही आाँखों िें अपनी िा
से शोभराज को साफ साफ ना कहने के मलए कह रही थी. िााँ भी तो िााँ थी. बेिी की बात सिझ तो गयी
लेककन उस बेिी की लम्बी खुशहाल श्जन्दगी भी तो िााँ को सोचनी थी. िााँ जानती थी कक टदशा को इस
घर िें कभी सुख नही मिलेगा. किला ने कलेजे पर पत्थर रख शोभराज से कहा, “दद्दा जैसा आप कह
रहे हो वैसा ही करोगे ? कहीीं िुझे ननराश तो नही होना पड़ेगा?”
टदशा ने िााँ की तरफ तडप कर दे खा. वो िााँ की इस बात का ितलब सिझती थी. उसे पता चल गया
कक उसका शोभराज के साथ जाना तय है लेककन शोभराज की बाींछे खखल उिीीं . ख़ुशी से झूिता हुआ किला
से बोला, “किला तू कहे तो िैं ककसी की कसि खाने को भी तैयार हूाँ . िैं जो भी कहकर जा रहा हूाँ वो
करूाँगा ही करूाँगा.”
किला शोभराज की बात का ववकवास कर बैिी. बेिी के उज्जवल भववष्य के टदवास्त्वप्न ने उसे अच्छा बुरा
सोचने के काबबल ही न छोड़ा. बोली, “िीक है दद्दा आप इसे ले जाना लेककन िुझे एकाध घींिे की िोहलत
और दे दीश्जये . ”
शोभराज ख़ुशी ख़ुशी बोला, “अरे क्यों नही. ये तुम्हारी बेिी है तुि श्जतना चाहो इसके साथ सिय बबताओ.
िैं भाईसाहब के पास जा रहा हूाँ . एक दो घींिे बाद आकर टदशा को अपने साथ शहर ले जाऊींगा. तुि बस
इसे तैयार कर दे ना.” इतना कह शोभराज वहाीं से आटदराज के घर की तरफ चला गया.
किला की आाँखें भर आई. उसे घर से टदशा को भेजना कतई अच्छा नही लग रहा था. टदशा भी जिीन
पर बैि घ ि
नों िें अपना ि ीं ु ह टदए फफक रही थी. उसे अपनी िााँ पर ग स्त्
सा आ रहा था. सोचती थी पता
नही िााँ िुझे यहााँ से क्यों भेज रही है .
किला ने मससक रही टदशा को दे खा. पैरों िें पड़े बुखार से तप रहे छोिू को उिाकर चारपाई पर मलिाया.
एक बच्चा अब भी किला की गोद िें था. उस बच्चे को भी किला ने छोिू के बगल िें मलिा टदया और
सीधी टदशा के पास जा पहुींची. किला ने उस द ख
ी हो रही लडकी के सर पर हाथ रखा तो टदशा ने गुस्त्स
िें अपनी िााँ का हाथ अपने सर से हिा टदया.
लेककन िााँ तो िााँ थी. उसे बेिी का द ुः ु ख ददच पता था. बोली, “टदशा बेिी तू िुझसे नाराज है क्या? बेिा
िें तेरे भले के मलए ऐसा कर रही हूाँ . तू वहाीं बहुत खुश रहेगी िेरी बच्ची. शहर िें बहुत अच्छी अच्छी चीज
होती हैं . वहाीं खाना भी बहुत अच्छा बनता है . द ध
भी मिलता है . कपड़े भी बहुत अच्छे अच्छे होते हैं . ”
टदशा ने अपना िुींह घुिनों से ननकाल िााँ की तरफ दे खा. उसका चेहरा आींसुओीं से लदा हुआ था. किला
बेिी का चेहरा दे ख बबलबबला कर रह गयी. टदशा रोते हुए िााँ से बोली, “िााँ िैं यहीीं िीक हूाँ . िुझे कुछ