Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | 页面 27

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गेहूाँ के सीजन की गिी का अींदाज़ा आराि से लगाया जा सकता है. तापिान पैंतालीस से तो कि रहता ही नही है लेककन इस औरत और बच्चों को इससे ज्यादा फकच नही पड़ता था. क्योंकक उन्हें पता था कक अगर दो से तीन ककलो गेहूाँ रोज इकट्ठा न हुए तो भूखा िरना पड़ेगा.
शोभराज किला के घर पहुींच चुका था. किला पुरानी सी साड़ी पहने एक बच्चे को दूध वपला रही थी. दूसरा उसके पैरों िें लेिा हुआ था. जो इस वक्त बुखार से तप रहा था. बड़ा लड़का जीतू ककताब िें कु छ पढ़ रहा था. जीतू से छोिी लडकी भी वहीीं बैिी खेल रही थी. बड़ी लड़की टदशा घर के काि िें लगी हुई थी. बच्चों के भी कपड़े बेहद पुराने और फिे हुए से थे. सब के सब धूप से काले रींग के हो गये थे. शरीरों को देख लगता था की बच्चे और किला रोज भूखे ही रहते होंगे.
शोभराज के पहुींचते ही किला ने चारपाई बबछा दी. सात साल का बड़ा लड़का जीतू हाथ के पींखे से शोभराज की हवा करने िें जुि गया. किला शोभराज के ननकम्िेपन को जानते हुए भी उसकी इज्जत अपने सगे जेि की तरह करती थी. शायद इस बात िें वो अपना नारी धिच ननभाती होगी.
किला ने अपनी नौ दस साल की लडकी को आवाज दे शोभराज के मलए चाय बनाने को कह टदया. बाकी के बच्चों के िुींह िें चाय के नाि से लार बन आई लेककन ननराशा भी हुई क्योंकक आज शोभराज ताऊ की चाय के बाद उनके मलए चाय नही बन पानी थी. दूध इतना नही होता था कक तीन बार चाय बन सके.
शोभराज ने किला के घर की गुरबत देखी तो अींदर से टहल गया लेककन टदल पर पत्थर रखा था और िन िें चालाकी भरी थी. गिी िें िींडाई पीने वाला शोभराज किला के घर की गिाचगिच चाय नहीीं पीना चाहता था. बोला,“ नही किला िैं चाय नही पीऊीं गा. अभी तुरींत भाई साहब के घर पीकर आ रहा हूाँ.” टदशा का हाथ वहीीं के वही रुक गया. बच्चों के िन कफर से खखल उिे. अब दूध का खचच नही होना था क्योंकक अब शोभराज के मलए चाय नही बननी थी. बच्चे ख़ुशी से झूि उिे.
किला शोभराज के सािने घूाँघि ककये जिीन पर बैिी थी. शोभराज ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,“ किला िैं तुम्हारी हालत को देख तुिसे कु छ कहना चाहता हूाँ. अभी तुि श्जस हालत िें हो उसे देख कर लगता है कक तुम्हारे बच्चे िीक से न तो पढ़ मलख पाएींगे और न िीक से खा पी सकें गे. िैंने सोचा है कक तुम्हारे एक बच्चे का पालन पोषण िें अपने खचे पर कर दू ीं.
उसे िैं पढ़ा मलखा दू ींगा और उसकी शादी भी िें अपने हाथों से कर दू ींगा. इस बात के मलए िें तुम्हारी बेिी टदशा को अपने घर ले जाना चाहता हूाँ. तुम्हारी जेिानी का िन भी इस लडकी से लगा रहेगा और तुम्हारा बोझ भी थोडा हल्का हो जायेगा. अगर तुि चाहो तो िेरे साथ टदशा को भेज सकती हो.”
किला ने टदशा की तरफ देखा. टदशा की आाँखों िें िााँ से अलग होने का भय था. वो लडकी अपनी िााँ और भाइयों को छोड़ कही और नही जाना चाहती थी. किला भी कब अपनी लाडली को अपने कलेजे से