Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Page 22

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सोचती उतना उलझती जाती थी.
अभी किला सोच ही रही थी कक िोहल्ले की एक औरत धन्नो किला के घर आ पहुींची. उदास बैिी किला को देख धन्नो ने पूींछ मलया,“ किला इतनी परेशान सी कै से टदख रही हो? क्या कोई परेशानी है क्या?”
किला बताना तो नही चाहती थी लेककन छु पाना भी तो िीक नही था. बोली,“ क्या बताउीं बहन. अभी हिारे खानदानी जेि आये थे. कह रहे थे सीिा की शादी कर दू ाँ. उन्होंने तो लड़का भी देख भर मलया लेककन शादी िें खचाच तो िुझे ही करना है जबकक घर िें जहर खाने को भी पैसा नही है. तुि तो सब जानती ही हो बहन. अब इसी धचींता िें बैिी हुई हूाँ.”
धन्नो वैसे तो बड़ी लडाींका थी लेककन टदल अींदर से थोडा निच था. उसने किला को दुुःख सहते बड़े करीब से देखा था. वो खुद ववधवापन का ददच झेल रही थी. उसे पता था कक घर िें अगर कोई आदिी किाने वाला न हो तो ककतनी िुश्ककलें आती हैं.
धन्नो थोडा सोचते हुए बोली,“ अच्छा किला तुम्हें सीिा की शादी िें पैसों की जरूरत सािान के मलए ही तो है न. अगर हि सब िोहल्ले के लोग मिलकर तुम्हें सािान दे दें तो तुम्हें बहुत सहारा मिल जायेगा और एकाध दो लोग तुम्हें कु छ सिय के मलए पैसा भी दे सकते हैं.”
किला सािने बैिी धन्नो का िुींह आकचयच से ताकते रह गयी. अभी वो कु छ कह पाती उससे पहले धन्नो वहाीं से उिकर चली गयी. किला को धन्नो की बात सिझ तो आई लेककन उतने िीक से नही श्जतनी आनी चाटहए थी.
बात बात पर लड़ने वाली धन्नो का टदल इतना बड़ा भी हो सकता है ये बात कि से कि ये बात किला को अब तक पता न थी. किला के टदिाग िें धन्नो का ववचार िीक लगा था. अगर सच िें िोहल्ले के लोग थोड़ी थोड़ी िदद कर देते हैं तो किला को आटदराज की िदद की जरूरत नही पडनी थी.
शाि होने को जा रही थी. किला अपने काि िें लगी पड़ी थी कक िोहल्ले के लोग उसके घर िें घुसने शुरू हो गये. सब के हाथों िें कु छ न कु छ था. लोगों के हाथ िें गेंहूाँ से लेकर शादी िें काि आने वाले अन्य सािान भी थे. देखते ही देखते कई बारे गेंहूाँ किला के घर िें आ पहुींचा.
धन्नो भी अपने घर से गेंहूाँ लेकर आयी थी. बोली,“ देखो किला अभी इतना सािान टदए जाते हैं. बाकी का दूध दही और िट्ठा शादी के सिय पर आ जायेगा. कु छ लोग रुपयों पैसो से भी तुम्हारी िदद करने के मलए तैयार है. श्जन्हें तुि आराि से लौिा देना और भी ककसी चीज की जरूरत हो तो बेटहचक कह देना.”
किला के िुींह से एक भी शब्द न ननकल पा रहा था. धन्नो का धन्यबाद भी तो न कर पा रही थी बेचारी किला. लेककन धन्नो भी कब चाहती थी कक किला से धन्यबाद सुने. आखखर एक अबला दूसरी अबला का साथ दे दे तो इसिें धन्यबाद और शुकक्रया की आवकयकता ही कहााँ रहती है.