Mummatiya by Dharmendra Rajmangal Mummatiya by Dharmendra Rajmangal | Página 19

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किला ने थोडा सोचा और बोली,“ दद्दा िैं अभी मसफच पाींच बीघे ही बेचूींगी. बाकी थोड़ी सी जिीन िेरे बच्चों के मलए भी रहनी चाटहए. िैं तो दुुःख के टदन काि जाउीं गी लेककन बच्चे कहााँ भिके कफरेंगे?” आटदराज वैसे तो सारी जिीन मलखवाना चाहता था जो कु ल मिलाकर सोलह बीघे होती थी.
लेककन किला के बच्चो की तरफ देख आटदराज का ननदचयी टदल भी ये सब कहने की टहम्ित न कर सका. परन्तु पाींच बीघे भी आटदराज की उम्िीद से बहुत ज्यादा थी. शायद रणवीर की िौत न होती तो ये पाींच बीघे जिीन भी नही मिलनी थी.
आटदराज का टदल ख़ुशी से भरा हुआ था लेककन इस ख़ुशी को छु पा बोला,“ िीक है बहू. कल तुम्हें पाींच बीघे के पैसे मिल जायेंगे.” इतना कह आटदराज किला के घर से चला गया. किला वही बैिी बैिी मससक पड़ी.
किला का वश चलता तो श्जन्दगी भर अपनी जिीन को बेचने की सोचती भी नही. श्जस जिीन िें ककसान की आत्िा बसी होती होती है उसको बेचने का दुुःख भी वही जानता है. श्जस जिीन िें अपने सगे लोगों की धचताएीं दफन होती है उसे ककसी के मलए भी बेचना इतना आसन नही होता है.
किला एक ककसान की बेिी थी और श्जस घर िें आई वो भी ककसान का ही घर था. जिीन ककसान के प्राण होते हैं. जिीन को बेचना प्राणों को बेचने जैसा होता है लेककन उस ककसान की अपनी िजबूररयाीं भी होती हैं. वरना यूाँ ही कोई अपने प्राणों का सौदा नही कर डालता.
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दूसरे टदन किला आटदराज के साथ तहसील पर जा उसके नाि अपनी पाींच बीघे जिीन मलख आई. आटदराज ने पन्रह हजार रूपये काि बाकी के रूपये किला को दे टदए. आटदराज ने किला को बताया कक ये पन्रह हजार रूपये रणवीर को टदल्ली ले जाने वाले टदन खचच हो गये थे.
किला इस बात से बहुत हैरान हुई कक िहीनों िें रणवीर के इलाज िें पन्रह बीस हजार रूपये खचच हुए और इक टदन िें पन्रह हजार का खचाच हो गया. इलाज भी तो कोई खास नही हुआ था. कु छ घींिों िें तो रणवीर की िौत ही हो गयी थी.
किला को आज अपने पनत की कही बात याद आ गयी. रणवीर ने आखखरी टदन भी आटदराज और शोभराज से िदद लेने से इनकार ककया था. लेककन किला को अपने पनत की श्जन्दगी के मलए सब कु छ खोने िें भी हजच नही था. परन्तु आज न तो पनत ही उसके पास था और न ही जिीन ही बच पायी थी.
किला चाहकर भी आटदराज से कु छ न कह सकती थी. चार लोग किला को ही गलत बताते. कहते एक तो िदद की ऊपर से बेईिानी का आरोप भी लगाती है. शायद आगे की िुश्ककलों िें दानपुर गााँव िें किला की िदद करने को भी कोई तैयार न होता. किला चुप हो बैि गयी.