May 2026_DA | Page 39

इसमें संदेह नहीं । कविता, कहानी, उपनयास, निबनध, आलोचना आदि कई विधाओं में दलित साहितय आज विकास कर रहा है, लेकिन अधिकांश की दिशा सपष्ट नहीं है, उसमें एक भटकाव दिखाई दे रहा है । नए दलित लेखकों में इतिहास और परमपरा का बोध है । परिणामसिरूप, कुछ गैर-दलित, विशेष रूप से रिाहण लेखक दलितों पर लिखकर दलित लेखकों के बीच समादृत हो रहे हैं । समादृत हो रहे हैं, कोई बात नहीं, कयोंकि दलित साहितय कोई भी लिख सकता है, पर वे नेतृति भी कर रहे हैं, यह दुखद है । यह हमारे इतिहास और परमपरा के विरुद्ध है । कबीर और रैदास साहेब ने रिाहण का नेतृति सिीकार नहीं किया, और बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने भी दलित आनदोलन का नेतृति किसी गैर-दलित को नहीं दिया था । हमें इस परमपरा को नहीं तोड़ना है । यह हमारे सौंदर्यशासत्र की परमपरा है, किसी गैर-दलित का नेतृति अगर हम सिीकार करेंगे, तो वह हमारी सौंदर्य-चेतना को बदल सकता है । यह एक बड़ी चुनलौती है, दलित साहितय के सामने । सवाल यह भी है कि यह चुनलौती कैसे पैदा हुई? मुझे इसके पीछे अधययन की समसया लगती है । आज के अधिकांश नए दलित लेखक इतिहास और परमपरा को पढ़कर नहीं आए हैं, उनिोंने डा. आंबेडकर को भी ठीक से नहीं पढ़ा है, वे अगर डा. आंबेडकर की ही सारी रचनाओं को पढ़ लें, तो मुझे वि्िास है कि वे एक नई चेतना और ऊर्जा से भर जायेंगे । कोई चुनलौती फिर पेश नहीं आएगी । कोई नेतृति उसे भटका नहीं सकेगा ।
सतत प्वाहित प्ाचीन परंपरागत धारा
दलित साहितय और अमबेडकरवादी साहितय देखने में एक लगता है, पर, दोनों एक है नहीं । अलग-अलग हैं । आंबेडकरवादी साहितय की अवधारणा डा. तेज सिंह ने दी थी । वह माकस्यिादी साहितय से प्रभावित थे, और उसकी प्रहतहरिया में आंबेडकरवादी साहितय रखना चाहते थे । मैं उनकी इस अवधारणा से असहमत
था । इस पर मेरा एक लेख भी छपा है । दरअसल जब हम आंबेडकरवादी साहितय कहते हैं, तो हम दलित साहितय का दायरा सीमित कर देते हैं और आंबेडकर से पहले और बाद की दलित चिंतन-धारा से कट जाते हैं । दलित साहितय का उद्ि या जनम न तो डा. आंबेडकर से शुरू हुआ है, और न डा. आंबेडकर पर खतम होता है । इसकी सुदीर्घ परमपरा है, जिसमें पूरी अवैदिक धारा समाहित है । कबीर और रैदास साहेब ही नहीं, बशलक उनसे भी पहले के समतामूलक समाज के सिप्नदशटी, शिलपकार और दार्शनिक इसके आधार-सतमभ हैं, यह परमपरा डा. आंबेडकर के आनदोलन और चिंतन से चेतनशील और ऊर्जावान हुई है और आगे भी यह वर्णवयिसथा के समूल-नाश में सभी भावी दलित-बहुजन नायकों से प्रेरणा लेती रहेगी ।
हिंदी दलित साहितय में ्त्ी- विमर्श का अभाव नहीं
ऐसा माना जाता है कि हिंदी दलित साहितय में दलित सत्री विमर्श का अभाव होता है । असल में यह दलित शिक्षा से जुड़ा हुआ मामला है । आज़ादी के पचास साल गुजर जाने के बाद भी
दलित जातियों में अशिक्षा भयानक सतर पर थी । गांवों में तो शसथहत और भी बदतर थी । शहरों में यह हाल था कि पूरी-पूरी बशसतयों में गिनती के एक-दो परिवार ही अपने बच्चों को पढ़ाने का साहस कर पाते थे, वो भी लड़कों को, लड़कियों को फिर भी नहीं पढ़ाते थे । लड़के पहले पढ़े और लड़कियां बहुत बाद में । इसे गरीबी कह लीजिए, या पुरुषवादी सोच कह लीजिए या कुछ भी, पर सच यही है कि शिक्षा का प्रसार पुरुषों में पहले हुआ, इसलिए साहितय में भी दलित पुरुष ही पहले आए । शसत्रयां बाद में आईं । लेकिन फिर भी यह आरोप पूरी तरह सच नहीं है कि हिंदी दलित साहितय में सत्री-विमर्श का अभाव है । अनेक दलित कहानियों में सत्री-विमर्श मलौजूद है । ओमप्रकाश वालमीहक की‘ अममा’, जयप्रकाश कर्दम की‘ सांग’, कुसुम वियोगी की‘ और वह पढ़ गई’ सत्री-विमर्श की ही कहानियां हैं । अजय नावरिया ने तो सत्री-विमर्श की कई कहानियां लिखी हैं । हालाँकि यह सत्री-विमर्श उस सतर का नहीं है, जो दलित लेखिकाओं के सियं के लेखन में उभरा है, पर हम यह नहीं कह सकते कि वहाँ एकदम अभाव है । अि्य ही पुरुष और सत्री-चेतना की दृष्टियाँ समान
ebZ 2026 39